वापस जहां से लौट के आया नहीं गया
जिसने दगा दिया वो भुलाया नहीं गया
खुलके किसी को दर्द बताया नहीं गया
चाहा है जिसे मैंने सदा जान से ज्यादा
वह शख्स कभी दिल से हटाया नहीं गया
तुम जा बसे हो जाने कौन से जहांन में
वापस जहां से लौट के आया नहीं गया
जिस तरह सजाया था स्वागत में आपके
घर-द्वार वैसा फिर से सजाया नहीं गया
घुट-घुट के अकेले ही सफर काट रहे हैं
तुमको भुलाना चाहा भुलाया नहीं गया
जो तुमको नहीं पसंद था वो आज तक
कदम कोई यहां पे उठाया नहीं गया
तुम हो नहीं जहां में ये एहसास है मुझे
लेकिन तुम्हारी याद का साया नहीं गया
*
~जयराम जय
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