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गुरू की महिमा का पर्व है गुरु पूर्णिमा

गुरू की महिमा का पर्व है गुरु पूर्णिमा

(श्रेष्ठा-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
गुरु का तात्पर्य है बड़ा। बड़ा होना कोई आकार और परिमाण नहीं बल्कि आदर्श, आचार-विचार और मूल्यों का स्तर है। इससे आंतरिक व्यक्तित्व का आकलन होता है। इसीलिए हमारे शास्त्र वाक्य में गुरु को ही ईश्वर के विभिन्न रूपों- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु को ब्रह्मा कहा गया क्योंकि वह शिष्य को बनाता है, नया जन्म देता है। गुरु को विष्णु कहा गया है क्योंकि वह शिष्य की रक्षा करता है और गुरु को साक्षात महेश्वर (शिव) भी कहा गया है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार करता है। गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान जी को गुरु बनाया। हनुमान जी 11वें रुद्र के अवतार हैं। इसलिए गुरु के सभी गुण उनके विद्यमान हैं। तुलसीदास जी कहते हैं- कृपा करहु गुरुदेव की नाई...। हनुमान जी ने सुग्रीव को शिक्षा दी तो वह किष्किंधा का राजा बना। विभीषण को ज्ञान दिया तो लंकापति बन गये। रावण को भी ज्ञान देने का प्रयास किया था लेकिन उस अभिमानी ने उपहास उड़ाया- मिला हमहिं कपि गुरु बड़ ग्यानी....। इसकी नतीजा यह हुआ कि रावण के वंश में कोई रोने वाला नहीं बचा था। उसी गुरु की महिमा को स्मरण करने के लिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनायी जाती है। एक श्रेष्ठ गुरु एक युगांतरकारी योग्य शिष्य की खोज के माध्यम से किस प्रकार से जगत की दिशा बदल देने में सफल हो जाते हैं! इतिहास साक्षी है कि जब जब किसी गुरु ने योग्य शिष्य की खोज की है या यूँ भी कह सकते हैं कि जब जब किसी शिष्य ने अपने गुरु के गुरुत्व को सिद्ध करने हेतु अपना सर्वस्व अर्पण किया है तब तब इतिहास ने अपना मार्ग बदला है!! ऋषि परशुराम और उनके शिष्य भीष्म की बड़ी ही शिक्षाप्रद कथा महाभारत में आती है। चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त की खोज और चन्द्रगुप्त को गढ़ने की प्रक्रिया में आप गुरु शिष्य दोनों का लक्ष्य के प्रति समर्पण और दोनों की लक्ष्यप्राप्ति के दिव्य परिणाम से इतिहास स्वयं रोमांचित हुआ था। समर्थ स्वामी रामदास द्वारा शिवाजी महाराज को गढ़ने की कथा पढ़िए। ये समर्थ रामदास जी की शिक्षा का ही परिणाम था की शिवाजी निस्पृह शासक के रूप में इतिहास में अपना नाम अमर कर गए। श्रेष्ठ शिष्य के रूप में हिन्दवी स्वराज के संस्थापक वीर शिवाजी ने अपना संपूर्ण राज्य गुरु समर्थ रामदास को गुरु दक्षिणा में समर्पित कर दिया। बाद में शिवाजी द्वारा गुरु के आदेश पर गुरु के प्रतिनिधि के रूप में राजा बने रहकर अपना कर्तव्य निभाने का भी बड़ा स्मरणीय प्रसंग इस चर्चा में आता है। पूज्य स्वामी परमहंस जी द्वारा स्वामी विवेकानंद की प्रज्ञा जागरण की कथा पढ़िए। रामकृष्ण परमहंस व ठाकुर मां की शिक्षा व आशीर्वाद का ही परिणाम रहा की विवेकानंद शिकागो की धर्मसंसद में अपने उच्चतम शिष्यत्व को सिद्ध करके व पश्चिम जगत के समक्ष वैदिक दर्शन का लोहा मनवाकर लौटे। इसी प्रकार डाक्टर हेडगेवार जी द्वारा गुरु गोलवलकर को संगठन सौंपने के पीछे की ईश्वरीय प्रेरणा का आभास कीजिए। श्रीगुरुजी ने डाक्टर हेडगेवार जी के गुरुमंत्र को ऐसा सिद्ध किया की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व के सर्वाधिक विशाल संगठन बनने की ओर अग्रसर हो चला. गुरूजी की अनुपम कल्पनाशक्ति व अद्भुत कर्मणाशक्ति का ही परिणाम है कि आज संघ का एक प्रचारक नरेन्द्र मोदी समूचे विश्व में भारत का डंका बजा पाने में सफल हो पाया है। संघ के दिव्य संगठन महामंत्र से भारत अपने प्राचीन विश्वगुरु के स्थान को पुनः प्राप्त करने व वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक तिहाई भाग का जनक होने की यात्रा में अग्रसर हो चला है। देश के तंत्र से अनुच्छेद 370 जैसी विकट उलझन को सुलझाने का श्रेय श्रीगुरुजी की शिक्षा से प्रेरित एक स्वयंसेवक को ही जाता है। सात सौ वर्षों पुराने विदेशी आक्रान्ता द्वारा हमारे माथे पर गुलामी के कलंक के प्रतीक बाबरी ढाँचे को हटवाकर भव्य श्रीराम जन्मभूमि का निर्माण गुरूजी की शिष्य परंपरा के वाहक प्रचारक के रूप में ही नरेन्द्र मोदी कर पाए हैं। गोरक्षपीठ के महंत अवेद्यनाथ जी द्वारा युवा क्षत्रिय योगी आदित्यनाथ जी को गोरखपुर पीठ सौंपने का उदाहरण देखिये। उत्तर प्रदेश को एक अपराध प्रदेश से संस्कार प्रदेश बनाने का कार्य योगी जी अपने गुरु से मिली शिक्षा के प्रति सतत पूज्य भाव धारने के कारण ही कर पाएं हैं। गुरु शिष्य की कथाओं के मध्य ऋषि द्रोणाचार्य व एकलव्य की कथा में छुपा गुरु की भविष्य दृष्टि व शिष्य के समर्पण भाव का उल्लेख भी परम आवश्यक है। एकलव्य का उल्लेख आने पर बहुधा ही यह कहा जाता है कि गुरु ने शिष्य का अंगूठा कटवा दिया। यहां अंगूठा देने का अर्थ अंगूठा काटकर देना नहीं अपितु हस्ताक्षर करके वचनबद्ध होना होता है। पहले साक्षर व्यक्ति भी अंगूठा लगाकर ही वचनपत्र लिखा करता था। कतिपय प्रपंचियों ने अंगूठा लगाकर वचनबद्ध होने की कथा को गुरु द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा काट लेने के रूप में दुष्प्रचारित किया। गुरु द्वारा योग्य शिष्य की खोज की कई कई ज्ञात अज्ञात कथाएँ हैं जिनसे युग परिवर्तन संभव हुआ है। जगतप्रसिद्ध सनातनी वीर गुरु गोविंदसिंह द्वारा अपनी सेना को गुरु की वाणी या गुरुग्रंथ साहिब को ही गुरु मानने का आदेश देना इस संदर्भ में एक पठनीय पाठ है। सिक्ख गुरुओं की परंपरा के एक से बढ़कर एक उद्भट, प्रकांड व वीर शिरोमणि शिष्यों का अवतरित होना भला कौन भूल सकता है? इस गुरु शिष्य परंपरा के शिष्यों की प्रत्येक पीढ़ी ने विदेशी मुस्लिम शासको के अत्याचारों से हिंदू समाज की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने की एक अंतहीन कथा लिख डाली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक परम पूजनीय डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्वयंसेवकों को भगवा ध्वज को गुरु मानने का परामर्श देना गुरु शिष्य परंपरा व श्रेष्ठ गुरु की खोज की चर्चा में एक अनुकरणीय प्रसंग है। वस्तुतः हेडगेवार जी का यह कहना कि व्यक्ति में दोष आ सकता है किंतु तत्व में नहीं अतः तत्व को ही गुरु मानना यही गुरु शिष्य परंपरा का मूलतत्व है।
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