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मध्यम वर्गीय परिवारों का दर्द

मध्यम वर्गीय परिवारों का दर्द

झोपड़ियां भी कब, सड़कों की बातें सुनती हैं,
फुटपाथों पर कब्जों से, राहें मुश्किल करती हैं।
झोपड़ियों ने ठान लिया, मुफ्त माल हक उसका,
मेहनत से स्वावलंबी बनें, कब झोपड़ियां गुनती हैं।

झोपडी और महलों की बातें, दरबार सदा सुना करते,
कच्चे पक्के घर जिनके, दरबारों की राह तका करते।
झोपडी और महलों को, नहीं होती चिन्ता रोटी की,
कच्चे पक्के घर वाले, इज्जत को संघर्ष किया करते।

कभी जानिए दर्द उनका भी, जो कच्चे पक्के घर रहते,
नियमों का पालन करते और सबसे ज्यादा कर भरते।
नहीं करें कहीं चोरी डाका, नहीं निगाहें मुफ्त माल पर,
बस राष्ट्र सफल समर्थ बनें, मध्य वर्गीय ये चाह करते।

अ कीर्ति वर्द्धन
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