संतुष्ट नहीं हो रहा
नदी किनारे बैठकर
देख रहा हूँ पानी को।
कैसे भागे जा रहा है
ऊपर नीचे टेढ़े मेढ़े रास्ते पर।
न कोई उसका लक्ष्य है
और न ही उसकी योजना।
फिर भी भागे जा रहा
वो पानी आगे आगे को।।
कितने गाँवों और शहरों के
दिलको छूकर ये भाग रही।
फिर भी अपने शीतल जल से
प्यास सभी की बुझा रही।
खेतों की फसलों को भी
हरा भरा करती जा रही।
और बिना देखे समझे ये
आगे आगे भागी जा रही।।
इसी तरह से होता है
हम इंसानो का मन।
जो दौड़े जा रहा है
बस देखा देखी में।
सब कुछ पास होकर भी
नहीं करता मदद किसी की।
और की चाहत रखते हुये
दिन रात भागता रहता है।।
पर संतुष्ट नहीं हो पाता
नदी की तरह जीवन में।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबईहमारे खबरों को शेयर करना न भूलें|
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