फनकार मारे फुफकार
कुचल डालो उन सर्पों को बेड़िया बनते पांव में
प्रीत छोड़ो उन लोगों से छिड़कते नमक घाव पे
विषधर के दंत तोड़ो रास्ता रोके दीवार बनकर
तूफां से भीड़ जाना हिमालय सा अडिग तनकर
जहरीले नाग जो बैठे राहों में फन को फैलाए
खुद को कर लो बुलंद जहर वो उगल ना पाए
कदम फूंक-फूंक रखो तूफां का पग पग डेरा है
काम हिम्मत ही आएगी भले मौसम सुनहरा है
जाने दो हवाओं को खिलाओ तुम फिजाओं को
बहारों का स्वागत कर लो बहा दो मधुर भावों को
पांव की बन जाए जंजीर कभी वो रिश्ते मत पालो
उगले नफरतें जो हरदम उन्हें भी घास मत डालो
किसी को देखकर मन में झरना प्रेम का बहता हो
हमसफर जग में वही जो सफर में साथ रहता हो
रमाकांत सोनी सुदर्शन
नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थानहमारे खबरों को शेयर करना न भूलें|
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