जय प्रकाश कुँवर
सहन नहीं होती अब गर्मी,कब वरसोगे बादल तुम।।
देख रही पथरायी आंखें,नभ में तेरा दौड़ लगाना।
कभी छुपाना सूर्य देव को, त्वरित गति से आना जाना ।
पड़ी दरारें खेतों में अब ,जीव जन्तु सब तड़प रहे हैं ।
झुलस रही है सब हरियाली , अब कब दरश दिखाओगे तुम ।
आना था तुमको आषाढ़ में ,सावन भी अब बीत रहा है ।
कहीं तुम्हारी भयानकता से ,मानव उब कर चीख रहा है ।
इसी देश के कुछ जगहों में ,बादल फटना जारी है ।
बाढ़ विनाश के तुम हो भागी , न्याय तुम्हारी न्यारी है ।
उत्तर में बादल का फटना , पश्चिम पुरब में बाढ़ ।
सावन भादो आना बाकी ,हाल ये रहा आषाढ़ ।
दक्षिण भारत में भी रहा , कमोवेश यह हाल ।
केवल मध्य ही रहा तड़पता ,हाल हो रहा बेहाल ।
किसी को इतना दिया है कि , पाने वाला भी रो रहा है ।
कहीं का मानव आस में तेरे , आसमान को देख रहा है ।
काले बादल उधर चले गए , उजले हम पर मंडराएं ।
आशा की अब तुम बरसोगे ,पवन लिए तुझे उड़ जाए ।
जो गंभीर काले घन रहते , तो हमको भी आशा रहती।
अब वरसोगे अब वरसोगे ,मन की भावनाएं ये कहती ।
पर जब टुकड़े हो बिखर जाते, उड़ जाते तुम पवन वेग से ।
मर जाती है दिल की आशा , तड़प उठता है दिल उद्वेग से ।
अट्टहास तब सूर्य लगाते , और हमें है खुब रुलाते ।
फिर भी तुम न पसीज पाए हो ,ना तर्जन ना गर्जन करते ।
सारा देश तुम्हारा ही है , पर ये कैसा न्याय तुम्हारा ।
देते किसी को हद से ज्यादा , किसी को इतना क्यों तड़पाते ।
इससे तो सब दुखी होते हैं , नहीं पाने वाला खुब रोता है ।
पर अत्यधिक पाने वाला तो , अपना सब खोता है ।
हे इन्द्र देव के दूत बादल तुम , अब तो हम पर रहम दिखाओ
पुरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण ,पुरा हुआ अब मध्य में आओ ।।
तुमको हम सब देव हैं कहते , तो क्या देव का यही न्याय है ।
छिनना प्राण और आशियाना , यह तो केवल अन्याय है ।
ऐसा होता रहा तो तुम ही , इस अन्याय के भागी बनोगे ।
समदर्शी बन जीतो दिल सबका , सबका तुम साथी बनोगे ।
देख तुम्हारा छोटा टुकड़ा , ऐसा सबको लगता है अब ।
लुटा दिए सब बादल फटने में , बचा नहीं है तुममें कुछ अब ।
तो क्या यों हम रहे तड़पते ,या फिर तुम बरसोगे हम पर ।
या फिर बाढ़ विनाश ही लेकर , आओगे समय चुकने पर ।
ऐ सावन के बादल तुम अब , इतना सब को मत तड़पाओ ।
दौड़ो मत केवल आकाश में , अब तो धरती पर आ जाओ ।
कुछ तो न्याय दिखाओ मेघा , बनो ना ऐसा निष्ठूर तुम ।
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