जमीनी स्तर से भ्रष्टाचार
(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
पहले जन प्रतिनिधि ईमानदार होते थे। जनता की सेवा करना ही उनका मुख्य ध्येय होता था। बचपन में बड़े नेताओं से कोई सम्पर्क नहीं रहा लेकिन हमारे गांव के प्रधान कभी समरेहटा गांव के रहने वाले हकीम बाबा हुआ करते थे। उनका नाम था ठाकुर अयोध्या सिंह लेकिन होम्योपैथी की दवा मुफ्त में देते थे और हकीम के नाम से मशहूर हो गये थे। गांव के स्तर से ही जड़ी-बूटियां एकत्रित करते और उन्हें कूट-काटकर दवा बनाते थे। किसी से कोई पैसा नहीं लेते। भगवान की कृपा से खेती-बारी अच्छी थी। उनके बारे में बेईमानी, भ्रष्टाचार की शिकायत कभी नहीं सुनी। उस समय राष्ट्रीयता पर भी ऐसे ही नेता हुआ करते थे लेकिन अब तो ईमानदारी जैसे गूलर का फूल हो गयी है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में महापौर का चुनाव लड़ने वाली महिला ने भ्रष्ट्राचार को ही मुद्दा बनाया था। उनको सफलता भी मिली लेकिन शपथ लेने के एक दिन बाद ही भ्रष्टाचार के मामले में उनको नोटिस मिल गया। इसके बाद तो पार्षदों की ईमानदारी पर भी चर्चा हो रही है।
दरअसल स्थानीय निकाय के चुनावों में दल-बदल का कोई नियम नहीं क्योंकि दलगत आधार पर चुनाव लड़ने की बाध्यता नहीं है लेकिन चुनाव विशुद्ध रूप से दलगत आधार पर ही लड़े जाते हैं। मध्य प्रदेश में भी हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में जमकर दल-बदल हुआ है। यह बात तो किसी से छिपी नहीं कि दल-बदल किसी न किसी लालच में ही किया जाता है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मालती राय ने कहा था कि शपथ लेती हूं कि भोपाल नगर निगम से भ्रष्टाचार खत्म करूंगी३ इस शपथ के साथ ही राय महापौर बन गई लेकिन इसकी खुशी सिर्फ एक दिन टिक सकी। अगले ही दिन उन्हें भ्रष्टाचार के 17 साल पुराने मामले में नोटिस मिल गया। मालती राय ने पूरा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा। भाजपा से टिकट मिलने के बाद सबसे पहले उन्होंने भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा किया और आखिर तक इसी पर अपना चुनावी कैंपेन जारी रखा। जीतने के बाद भी सबसे पहले इसी की शपथ ली। शपथ के अगले ही दिन उन्हें 7 अगस्त को नर्मदापुरम संभागायुक्त माल सिंह द्वारा एमपी नगर में कथित 85 लाख रुपए के भ्रष्टाचार के मामले का नोटिस मिल गया। यह नोटिस संभागायुक्त ने 26 जुलाई को जारी किया था। यह नोटिस तत्कालीन परिषद में शामिल रहे सभी 39 पार्षदों को भेजा गया है।
मध्यप्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकायों के चुनाव के तत्काल बाद जिस तरह से निर्वाचित प्रतिनिधियों ने दलबदल किया उसके बाद वोटर के बीच उसकी छवि पर भी विपरीत असर पड़ा है। दल बदल की बढ़ती प्रवृति लोकतंत्र के लिए भी घातक मानी जा रही है। नगरीय निकाय के चुनाव के बाद पार्षदों की घेराबंदी भी उसी तरह हो रही थी, जिस तरह सरकार बनाने और गिराने के लिए विधायकों की जाती है। मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय के चुनाव की दो अलग-अलग व्यवस्था लागू हैं। नगर निगम में महापौर का चुनाव जनता सीधे करती है। जबकि नगर परिषद में अध्यक्ष का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है। मध्यप्रदेश के हाल ही में संपन्न हुए नगरीय निकाय के चुनाव में साठ प्रतिशत से भी कम वोटिंग ने नेताओं की नींद उड़ा दी थी। नेताओं की घटती विश्वसनीयता के कारण ही वोटिंग मशीन में नोटा का बटन जुड़ने को बड़ा कारण माना गया था। कई चुनावों में तो नोटा के खाते में आए वोटों से हार-जीत का गणित बदलते देखा गया। मध्यप्रदेश के अधिकांश बड़े शहरों में भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित पार्षदों की संख्या ज्यादा है लेकिन, कुछ स्थानों पर महापौर कांग्रेस का निर्वाचित हुआ अथवा निर्दलीय या अन्य दल के उम्मीदवार को जीत मिली। परिषद के सभापति का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है। सभापति के चुनाव के अलावा नगर परिषद के अध्यक्ष के चुनाव में भी राजनीतिक दलों को अपने पार्षदों की घेराबंदी करना पड़ी। इसके बाद भी कई स्थानों पर बहुमत के बाद भी राजनीतिक दल अपना अध्यक्ष अथवा सभापति निर्वाचित नहीं करा सके।
शिवपुरी जिले की पिछोर नगर पालिका परिषद बहुमत भाजपा का था लेकिन, पार्षदों ने अध्यक्ष कांग्रेस का चुना। यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि क्रॉस वोटिंग कांग्रेस के पक्ष में हुई जबकि देश में सरकारें गिराने और दल बदल कराने के सबसे ज्यादा आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लग रहे हैं। राष्ट्रपति के चुनाव में भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस के विधायकों की ओर से क्रॉस वोटिंग हुई थी। दलबदल जितना सहज और सरल हो गया है, वोटर के लिए नेता उतना ही अविश्वसनीय होता जा रहा है। आजादी के बाद से ही नेताओं की छवि पर सवाल खडे़ होते रहे हैं। जन सेवा का भाव ही नेताओं के एजेंडे से गायब होता जा रहा है। किसी भी स्तर का चुनाव जीतने के बाद नेताओं के रहन-सहन में जो बदलाव लाता है,वह वोटर की निगाह से बच नहीं पाता। देश में लगातार दल बदल की घटनाओं के साथ नेताओं के व्यक्तिगत हित की चर्चा भी व्यापक तौर पर होती है। देश के किसी भी राज्य में ऐसा कोई कानून नहीं है जो स्थानीय निकायों के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को दलबदल करने से रोकता हो। अभी सांसद और विधायकों के दलबदल को रोकने वाला ही कानून देश में लागू है। इसके बाद भी देश में बढ़ी संख्या में विधायक दल बदल करते देखे जा सकते हैं। कई राज्यों में बहुमत वाली सरकारें दल बदल के कारण अल्पमत में आईं। बाद में उस दल की सरकार बनी जिसे जनता ने सरकार बनाने का जनादेश नहीं दिया था। कर्नाटक और मध्यप्रदेश में भी विधायकों के इस्तीफे दिए जाने के कारण सरकारें अल्पमत में आईं।
संविधान के अनुसार सांसद अथवा विधायक के तौर पर निर्वाचित व्यक्ति यदि इस्तीफा देकर दूसरे दल में शामिल होता है तो वह गलत नहीं माना जा सकता। विधायकों और सांसदों के दल बदल में अब यही पैटर्न देखने को मिल रहा है। लेकिन निकायों के प्रतिनिधि दल को छोड़े बगैर ही क्रॉस वोटिंग के जरिए अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगा रहे हैं। भोपाल में भ्रष्टाचार का मामला सामने आने पर कांग्रेस हमलावर हो गई है। महापौर चुनाव में मालती से हारीं कांग्रेस की विभा पटेल ने कहा कि मालती ने झूठा वादा कर चुनाव जीता है. अब उन्हें नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना चाहिए वहीं, इस मामले में पूर्व सांसद आलोक संजर, मौजूदा विधायक विष्णु खत्री, वर्तमान पार्षद पप्पू विलास के साथ भाजपा नेता व तत्कालीन पार्षद अनिल अग्रवाल लिली, केवल मिश्रा, विष्णु राठौर और दिनेश यादव आदि के फंसने पर कांग्रेस ने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की जीरो टालरेंस की हकीकत उजागर हो गई है.केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बाद भी 17 साल पुराने मामले में अचानक नोटिस जारी होने से सभी हतप्रद हैं। खास बात यह है कि मालती को मिले नोटिस पर 26 जुलाई की तारीख दर्ज है, लेकिन उन्हें यह नोटिस उनके शपथ ग्रहण के अगले दिन यानी 7 अगस्त को प्राप्त हुआ है। महापौर मालती राय ने खुद को बेगुनाह बताया है लेकिन उन्हें अब नोटिस की वजह से सुनवाई में जाना पड़ेगा। साल 2005 में एमपी नगर जोन-2 में 5 करोड़ 45 लाख 70 हजार रुपए की लागत से सीसी रोड का यह मामला है।
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