किसको कैसे पीर दिखाऊँ?
डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी
किसको कैसे पीर दिखाऊँ?
अंतर्मन में घाव बहुत हैं,
अनचाहत के भाव बहुत हैं ;
दूर-दृष्टि पर घना अँधेरा
कैसे जग को मर्म बताऊँ?
किसको कैसे पीर दिखाऊँ?
आंधी-ओला डेरा डाले,
हुआ बसेरा तमस हवाले,
तारे सभी तिरोहित नभ में
आगे कैसे पाँव बढ़ाऊँ?
किसको कैसे पीर दिखाऊँ?
अपने भी जब छोड़ चले हैं,
रिश्ते नाते तोड़ चले हैं,
करुणा-ममता मोड़ चले हैं
किससे फिर अब प्रीत लगाऊँ?
किसको कैसे पीर दिखाऊँ?
अपनों का साहस है छूटा,
मन का भी विश्वास है टूटा,
जग की इस होड़ा-होड़ी में
किसकी छवि फिर हृदय बसाऊँ?
किसको कैसे पीर दिखाऊँ?
यही ईश्वर की कठिन परीक्षा,
पूर्ण न होती मानवी इच्छा,
हुई नहीं भव-भाव समीक्षा
किसका फिर कैसे यश गाऊँ?
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