महंगाई में रसोई का बढ़ता खर्च
(बृजमोहन पन्त-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
महंगाई यानि मूल्य वृद्धि एक वैश्विक समस्या है। महंगाई निर्धन व मध्य वर्ग के लोगों की कमर तोड़ देती है। मूल्य वृद्धि सरकारी प्रयासों से नियंत्रण में आ सकती है, लेकिन इसको पूर्ण रूप से नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता। क्योंकि महंगाई के पीछे कई कारण है। खाद्यान्नों, खाद्य तेल व दालों और साग-सब्जियों में मूल्य वृद्धि के कारण गृहणियों का बजट गड़बड़ा जाता है। भारत में अनाज की कोई किल्लत नहीं है लेकिन सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खामियों के कारण लोगों को महंगा अनाज खरीदना पड़ता है। सरकारी गोदाम अनाज से पटे पड़े है। काफी मात्रा में अनाज खुले में बारिश में खराब होता रहता है। गेहूं हो या चावल या चीनी वर्षा में भीगने के बाद (मोइस्चर) के कारण खाने योग्य नहीं रहता।
सस्ते गल्ले की दुकान से ऐसे अनाज को लौटा दिया जाता है। राशन विक्रेताओं का कोटा समाप्त नहीं होता जिस कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। कई उपभोक्ताओं के फिंगर प्रिंट कम्प्यूटर मशीन में नहीं आ पाते जिसके कारण वे अपने राशन कार्ड से यूनिट के राशन नहीं ले पाते हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए सरकारी प्रयास किये गये हैं लेकिन तकनीकी व व्यावहारिक कारणों से राशन उपभोक्ताओं को राशन नहीं मिल पा रहा है। कई उपभोक्ता व्यवस्था के कारण बाजार से ऊँचे दामों पर अनाज खरीद रहे हैं। गरीबों के कोटे का अनाज बाजार में बिक रहा है।
किसान अनाज पैदा करता है। यह उपज गेहूं, धान, गन्ना, दालें, सरसों, साग-सब्जियां व अन्य फसलें हेाती है। किसान को अपनी उपज का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इस कारण हतोत्साहित होता है। उर्वरक, कीटनाशक, सिचाई, विद्युत का खर्च, फसलों की देख रेख व आवश्यक कृषि उपकरणों पर काफी खर्च होता है। जुताई पर खर्च होता है। छोटे किसान टैªक्टर नहीं खरीद पाते व अभी भी परम्परागत ढंग से जुताई कर रहे हैं। सरकार द्वारा समर्थन मूल्य में वृद्वि के बाद भी फसलों का उचित मूल्य किसानों को नहीं मिल पा रहा है।
बड़े किसान जहां खुशहाल हैं, छोटे किसान बेहाल हैं। किसान सम्मान निधि ऊंट के मुंह में जीरा है। फिर भी निर्धन किसानों के लिए सहारा है जिसकी वे हर चार माह में आस लगाये बैठे होते हैं, किसान क्रेडिट कार्ड से किसानों के लिए ऋण की व्यवस्था है। अगले साल ऋण न चुकता करने पर व्याज जुड़ जाता है। खेती से इतनी आय नहीं होती ताकि समय पर ऋण चुकता कर सकें। केन्द्र सरकार ने किसानों को सस्ता लोन देने का एलान किया है। व्याज पर 1.5 फीसद छूट की बात कही गयी है। किसानों को हो सकता है इससे कुछ राहत मिल सके। अन्नदाता खुश रहेगा तो फसलें लहलहायेंगी।
किसानों को सिंचाई के लिए मानसून व ट्यूबवेल पर निर्भर रहना पड़ता है। हरी भरी फसलों के लिए अच्छा मानसून व ट्यूबवेलों के लिए उचित जलस्तर व निर्बाध विद्युत आपूर्ति जरूरी है। किसानों को कृषि श्रमिकों को मजदूरी देनी पड़ती है। अनेक ऐसे कारण हैं जिससे उत्पादन में कमी आती है। गन्ना देश में खूब होता है लेकिन चीनी मंहगी है। कभी दाल या तिलहन का उत्पादन घटता है तो दालें व खाद्य तेल महंगे हो जाते हैं। किसानों का दालों के उत्पादन से मोह भंग हो रहा है। इसका कारण जलवायु परिवर्तन व उपज का उचित मूल्य न मिलना है।
कृषि मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत विश्व में दालों की 25 फीसद (22.25) मिलियन टन, उपयोग में 27 फीसद व आयात में भागीदारी करता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व उत्तरप्रदेश की दालों के पैदावार में 50 फीसद भागीदारी है। मूंग व मसूर का उत्पादन कम है। वर्ष 2020-22 खरीफ सीजन में बुवाई 70.693 लाख हेक्टेयर ही रह गयी है।
केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा है कि देश में दालों का उत्पादन बढ़ रहा है। गत वर्ष में जो 2.54 करोड़ टन था, वह 2.76 करोड़ टन पहुंच गया है। तिलहन का उत्पादन 3.50 करोड़ टन से बढ़कर 3.76 करोड़ टन हो गया है। गन्ने का उत्पादन भी तीन करोड़ टन बढ़ा है। अनाज की पैदावार बढ़ी है परन्तु गेहूं की पैदावार में तीन प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी है। आज खाद्य तेलों की अधिक मांग है। आपूर्ति के अनुसार मूल्य निर्धारित होते है। खाद्य तेलों का उपभोग रोजमर्रा के जीवन में अधिक है। पोषण के लिए दालों के प्रोटीन की जरूरत है किन्तु कीमत घटने का नाम नहीं लेती। पेट्रोल डीजल मंहगा होता है तो ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ जाता है जिसका असर वस्तुओं की आपूर्ति पर पड़ता है जिससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती है। कीमतों के बढ़ने के कई कारण हैं लेकिन जनता इस समय मंहगाई से त्रस्त है।
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