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शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण होता है महारथी

शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण होता है महारथी

रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। 

प्रश्न-द्रौपदी के पांच पुत्र कौन थे।

उत्तर-प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन-ये पांचों क्रमशः युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव के औरस और द्रौपदी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। इनको रात्रि के समय अश्वत्थामा ने मार डाला था।

प्रश्न-‘सर्वे एवं महारथाः’ इस कथन का क्या भाव है?

उत्तर-शास्त्र और शस्त्र विद्या में अत्यन्त निपुण उस असाधारण वीर को महारथी कहते हैं, जो अकेला ही दस हजार धनुर्धारी योद्धाओं का युद्ध में संचालन करता हो।

एको दशसस्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनाम्।

शस्त्रशास्त्रवीणश्व महारथ इति स्मृतः।।

दुर्योधन ने यहाँ जिन योद्धाओं के नाम लिये हैं, ये सभी महारथी हैं-इसी भाव से ऐसा कहा गया है। प्रायः इन सभी वीरों के पराक्रम का पृथक-पृथक रूप से विस्तृत वर्णन पाया जाता है। वहाँ भी इन्हें अतिरथी और महारथी बतलाया गया है। इसके अतिरिक्त पाण्डव सेना में और भी बहुत से महारथी थे, उनके भी नाम वहाँ बतलाये गये हैं। यहाँ ‘सर्वे’ पद से दुर्योधन का कथन उन सबके लिये भी समझ लेना चाहिये।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते।। 7।।

प्रश्न-‘तु’ पदका क्या अभिप्राय है? और ‘अस्माकम्‘ के साथ इसका प्रयोग करके क्या भाव दिखलाया है?

उत्तर-‘तु’ पद यहाँ ‘भी’ के अर्थ में है; इसका ‘अस्माकम्’ के साथ प्रयोग करके दुर्योधन यह कहना चाहते हैं कि केवल पाण्डव-सेना में ही नहीं, अपने पक्ष में भी बहुत से-महान् शूरवीर हैं।

प्रश्न-‘विशिष्टाः‘ पद से निका लक्ष्य है? और ‘निबोध’ क्रियापद का क्या भाव है?

उत्तर-दुर्योधन ने ‘विशिष्टा‘; पद का प्रयोग उनके लक्ष्य से किया है, जो उनकी सेना में सबसे बढ़कर वीर, धीर, बलवान्, बुद्धिमान, साहसी, पराक्रमी, तेजस्वी और शस्त्र विद्या विशारद पुरुष थे और ‘निबोध’ क्रिया पद से यह सूचित किया है कि अपनी सेना में भी ऐसे सर्वोत्तम शूरवीरों की कमी नहीं है, मैं उनमें से कुछ चुने हुए वीरों के नाम आपकी विशेष जानकारी के लिए बतलाता हूँ, आप मुझसे सुनिये।

भवान् भीष्मश्व कर्णश्व कृपश्व समितिअज्यः।

अश्वत्थामा विकर्णश्व सौमदत्तिस्तथैव च।। 8।।

प्रश्न-द्रोणाचार्य कौन थे और दुर्योधन ने समस्त वीरों में सबसे पहले उन्हें ‘आप’ कहकर उनका नाम किस हेतु से लिया?

उत्तर-द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। इन्होंने महर्षि अग्निवेश्य से और श्री परशुराम जी से रहस्य समेत समस्त अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किये थे। ये वेद-वेदांग के ज्ञाता, महान् तपस्वी, धनुर्वेद तथा शशास्त्र विद्या के अत्यन्त मर्मज्ञ और अनुभवी एवं युद्धकला में नितान्त निपुण और परम साहसी अतिरथी वीर थे। ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र आदि विचित्र अस्त्रों का प्रयोग करना इन्हें भलीभाँति ज्ञात था। युद्ध क्षेत्र में जिस समय ये अपनी पूरी शक्ति से भिड़ जाते थे, उस समय इन्हें कोई भी जीत नहीं सकता था। इनका विवाह महर्षि शरद्वान की कन्या कृपी से हुआ था। इन्हीं से अश्वत्थामा उत्पन्न हुए थे। राजा द्रुपद के ये बालसखा थे। एक समय इन्होंने दु्रपद के पास जाकर उन्हें प्रियमित्र कहा, तब ऐश्वर्य-मद से चूर द्रुपद ने इनका अपमान करते हुए कहा-‘मेरे-जैसे ऐश्वर्य सम्पन्न राजा के साथ तुम-सरीखे निर्धन, दरिद्र मनुष्य की मित्रता किसी तरह भी नहीं हो सकती।’ दु्रपद के इस तिरस्कार से इन्हें बड़ी मर्मवेदना हुई और ये हस्तिनापुर में आकर अपने साले कृपाचार्य के पास रहने लगे। वहाँ पितामह भीष्म से इनका परिचय हुआ और इन्हें कौरव-पाण्डवों की शिक्षा के लिये नियुक्त किया गया। शिक्षा समाप्त होने पर गुरु दक्षिणा के रूप में इन्होंने दु्रपद को पकड़ लाने के लिये शिष्यों से कहा। महात्मा अर्जुन ही गुरू की इस आज्ञा का पालन कर सके और दु्रपद को रण क्षेत्र में हराकर सचिव सहित पकड़ लाये। द्रोण ने दु्रपद को बिना मारे छोड़ दिया, परन्तु भागीरथी से उत्तर भाग का उनका राज्य ले लिया। महाभारत युद्ध में इन्होंने पांच दिन तक सेनापति के पद पर रहरकर बड़ा ही घोर युद्ध किया और अन्त में अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु का भ्रम मूलक समाचार सुनकर इन्होंने शशास्त्र का परित्याग कर दिया और समाधिस्थ होकर ये भगवान का ध्यान करने लगे। इनके प्राण त्याग करने पर इनके ज्योतिर्मय स्वरूप का ऐसा तेज फैला कि सारा आकाश मण्डल तेज राशि से परिपूर्ण हो गया। इसी अवस्था में धृष्टद्युम्न ने तीखी तलवार से इनका सिर काट डाला।

यहाँ दुर्योधन ने इन्हें ‘आप’ कहकर सबसे पहले इन्हें इसीलिये गिनाया कि जिससे ये खूब प्रसन्न हो जायें और मेरे पक्ष में अधिक उत्साह से युद्ध करें। शिक्षा गुरू होने के नाते आदर के लिये भी सर्वप्रथम ‘आप’ कहकर इन्हें गिनाना युक्तिसंगत ही है।

प्रश्न-भीष्म कौन थे? उत्तर-भीष्म राजा शान्तनु के पुत्र थे। भागीरथी गंगा जी से इनका जन्म हुआ था। ये? नामक नवम वसु के अवतार थे इनका पहला नाम देवव्रत था। इन्होंने सत्यवती के साथ अपने पिता का विवाह करवाने के लिये सत्यवती के पालनकर्ता पिता के आज्ञानुसार, पूर्ण युवावस्था में ही स्वयं जीवन भर कभी विवाह न करने की तथा राज्यपद के त्याग की भीषण प्रतिज्ञा कर ली थी; इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण इनका नाम भीष्म पड़ गया। पिता के सुख के लिये इन्होंने प्रायः मनुष्य मात्र के परम लोभनीय स्त्री-सुख और राज्य-सुख का सर्वथा त्याग कर दिया। इससे परम प्रसन्न होकर इनके पिता शान्तनु ने इन्हंे यह वरदान दिया कि तुम्हारी इच्छा के बिना मृत्यु भी तुम्हें नहीं मार सकेगी। ये बाल ब्रह्मचारी, अत्यन्त तेजस्वी, शस्त्र और शास्त्र के दोनों के पूर्ण पारदर्शी और अनुभवी, महान ज्ञानी और महान वीर तथा दृढ़निश्चयी महापुरुष थे। इनमें शौर्य, वीर्य, त्याग, तितिक्षा, क्षमा, दया, शम, दम, सत्य, अहिंसा, सन्तोष, शान्ति, बल, तेज, न्यायप्रियता, नम्रता, उदारता, लोकप्रियता, स्पष्टवादिता, साहस, ब्रह्मचर्य, विरति, ज्ञान, विज्ञान, मातृ-पितृ-भक्ति और गुरूसेवन आदि प्रायः सभी सद्गुण पूर्णरूप से विकसित थे। भगवान् की भक्ति से तो इनका जीवन ओतप्रोत था। ये भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप और तत्व को भलीभांति जानने वाले और उनके एकनिष्ठ, पूर्ण-श्रद्धासम्पन्न और परम प्रेमी भक्त थे। महाभारत-युद्ध में इनकी समानता करने वाला दूसरा कोई भी वीर नहीं था। इन्होंने दुर्योधन के सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं पाँचों पाण्डवों को तो कभी नहीं मारूँगा, परन्तु प्रतिदिन दस हजार योद्धाओं को मारता रहँूगा। इन्होंने कौरव पक्ष में प्रधान सेनापति के पद पर रहकर दस दिनों तक घोर युद्ध किया। तदनन्तर शरशय्या पर पड़े-पड़े सबको महान् ज्ञान का उपदेश देकर उत्तरायण आ जाने के बाद स्वेच्छा से देह त्याग किया।
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