सनातन सार
बंध और प्रतिबंध सब, जब टूटने लग जायेंगे,
अराजकता चहुँ ओर होगी, नियम ढह जायेंगे।
नीर सी ही चीर की भी, मर्यादा होगी तार तार,
गर सामाजिक बन्धनों के, तटबन्ध टूट जायेंगे।
स्वार्थ की जब बात होगी कौन किसका तब यहाँ,
मानवता दम तोड देगी, और, मूल्य मर जायेंगे।
वसुधैव कुटुम्ब की धारणा, सर्वे सन्तु निरामया,
सनातन का साथ छोडा, सब धरे रह जायेंगे।
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