
आकुल आकाश हो गया सिमट गये
इन्द्र धनुष बाँहों के
आकुल आकाश हो गया
नाच रही किरन-किरन
रंग का रचाव लिये
शब्द-शब्द प्राण हँसे
प्यार का प्रभाव लिये
हौले से
तोड़ बाँध संयम के
अधरों में प्यास बो गया
बहकती बहार हँसी
मौसम के संग -संग
नेह बेल छैल गई
तरुवर पर अंग-अंग
अधरों में
महक गया चन्दन वन
जाने क्या खास हो गया
आतुर थे दोनों तट
मिलने को आर-पार
नदिया में डूब -डूब
जाने को बार-बार
दहक रही
मधुगन्धी साँसों को
सोंधा विश्वास हो गया
*
~जयराम जय
'पर्णिका' बी-11/1कृष्ण विहार आवास विकास कल्याणपुर कानपुर208017(उ.प्र.)
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