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अब वही मूँग छाती पे दलने लगा

अब वही मूँग छाती पे दलने लगा

अब तो पानी भी
सर से गुज़रने लगा ।
आदमी - आदमी
को है छलने लगा ।।


क्यों प्रगति हो रही है
मिरी देखकर।
खाँमखाँ में मेरा खाश
जलने लगा ।।


कैसा मौसम है कैसी
हवा है चली।
रुख ज़माना भी अपना
बदलने लगा ।।


साथ देगा मेरा उसने
वादा किया ।
काम निकला तो फौरन
निकलने लगा।।


जय ने अपना समझ
साथ जिसका दिया।
अब वही मूँग छाती पे
दलने लगा ।।
००
~जयराम जय
पर्णिका,बी-11/1,कृष्ण विहार आवास विकासकल्याणपुर,कानपुर-208017(उ.प्र.)
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