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कृष्णराज सागर बांध बनाने वाले डा. एम. विश्वेश्वरैया

कृष्णराज सागर बांध बनाने वाले डा. एम. विश्वेश्वरैया

(मनीषा स्वामी कपूर-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
हमारा देश डा. मोक्ष गुंडम विश्वेश्वरैया को इंजीनियरिंग के लिए ही नहीं अपित मानवता की सेवा के लिए याद करता है। मैसूर के दुर्गम स्थल पर कृष्ण राज सागर बांध बनाने वाले इस इंजीनियर को हैदराबाद सिटी बनाने का भी पूरा श्रेय है। वहां उन्हांेने एक बाढ़ सुरक्षा प्रणाली तैयार की थी। इसी प्रकार विशाखापट्टनम बंदरगाह की सुरक्षा के लिए प्रणाली विकसित की थी। जिससे समुद्र की गरजती हुई लहरें विनाशलीला नहीं कर पायीं। डा. विश्वेश्वरैया ने समूचे विश्व को प्रेरित किया कि अभियंताओं (इंजीनियरों) को सिर्फ निर्माण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में न देखा जाए बल्कि मानवता की सेवा करने वाले व्यक्तित्व के रूप में उसे समादृत किया जाए। इसी के बाद ईरान, बेल्जियम, रोमोनिया आदि देशों में भी अभियंता दिवस मनाया जाने लगा। भारत में डा. एम विश्वेश्वरैया के जन्मदिन 15 सितम्बर को अभियंता दिवस मनाया जाता है। अभियंता दिवस पर उन इंजीनियरों को भी डा. विश्वेश्वरैया के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए जो पुलों, बांधों के निर्माण में लापरवाही बरतते हैं और इसके चलते जन-धन की क्षति उठानी पड़ती है। भारत में हर साल 15 सितंबर को अभियंता दिवस (इंजीनियर्स डे) के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, इसी दिन भारत के महान अभियंता और भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्मदिन है। वह भारत के महान इंजीनियरों में से एक थे। उन्होंने ही आधुनिक भारत की रचना की और देश को एक नया रूप दिया। उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है, जिसे शायद ही कोई भुला पाए। देशभर में बने कई नदियों के बांध और पुल को कामयाब बनाने के पीछे विश्वेश्वरय्या का बहुत बड़ा हाथ है। उन्हीं की वजह से देश में पानी की समस्या दूर हुई थी।भारत सरकार द्वारा साल 1968 में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जन्मतिथि को अभियंता दिवस घोषित किया गया था। उसके बाद से हर साल 15 सितंबर को अभियंता दिवस मनाया जाता है। दरअसल, 15 सितंबर 1860 को विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले में हुआ था।एक इंजीनियर के रूप में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने देश में कई बांध बनवाए हैं, जिसमें मैसूर में कृृष्णराज सागर बांध, पुणे के खड़कवासला जलाशय में बांध और ग्वालियर में तिगरा बांध आदि महत्वपूर्ण हैं। सिर्फ यही नहीं, हैदराबाद सिटी को बनाने का पूरा श्रेय डॉ. विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन्होंने वहां एक बाढ़ सुरक्षा प्रणाली तैयार की थी, जिसके बाद पूरे भारत में उनका नाम हो गया। उन्होंने समुद्र कटाव से विशाखापत्तनम बंदरगाह की सुरक्षा के लिए एक प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

विश्वेश्वरैया को मॉडर्न मैसूर स्टेट का पिता भी कहा जाता था। उन्होंने मैसूर सरकार के साथ मिलकर कई फैक्ट्रियों और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करवाई थी, जिसमें मैसूर साबुन फैक्ट्री, मैसूर आयरन एंड स्टील फैक्ट्री, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, मैसूर चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स और विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग प्रमुख रूप से शामिल हैं।

अभियंता दिवस सिर्फ भारत में ही नहीं मनाया जाता बल्कि कई अन्य देशों में भी यह दिवस मनाया जाता है। जैसे कि- अर्जेंटीना में 16 जून को, बांग्लादेश में सात मई को, इटली में 15 जून को, तुर्की में पांच दिसंबर को, ईरान में 24 फरवरी को, बेल्जियम में 20 मार्च को और रोमानिया में 14 सितंबर को अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, यह दिवस दुनियाभर के इंजीनियरों को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वो देश-दुनिया को अपने हुनर की बदौलत तरक्की की नई राह पर ले जाएं।

एक सौ एक वर्ष का यशस्वी जीवन जीने वाले मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया सदैव भारतीय आकाश में अपना प्रकाश बिखेरते रहेंगे। भारत सरकार द्वारा 1968 ई. में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जन्म तिथि को अभियंता दिवस घोषित किया गया था, तब से हर वर्ष इस पुनीत अवसर पर सभी भारतीय अभियंता एकत्रित होकर उनकी प्रेरणादायी कृतित्व एवं आदर्शो के प्रति श्रद्धा-सुमन अर्पित कर अपने कार्य-कलापों का आत्म विमोचन करते हैं और इसे संकल्प दिवस के रूप में मनाने का प्रण लेते हैं।

भारत की आजादी के बाद नये भारत के निर्माण और विकास में प्रतिभावान इंजीनियरों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। गांव एवं शहरों के समग्र विकास के लिए सड़कों, पुल-पुलियों और सिंचाई जलाशयों सहित अधोसंरचना निर्माण के अनेक कार्य हो रहे हैं। हमारे इंजीनियरों ने अपनी कुशलता से इन सभी निर्माण कार्यो को गति प्रदान की है। राज्य और देश के विकास में इंजीनियरों के इस योगदान के साथ-साथ अभियंता दिवस के इस मौके पर भारतरत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की प्रेरणादायक जीवन गाथा को भी याद किया जाता है।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य भी हैं, जो आज किसी भी अभियन्ता को प्रेरणा प्रदान करने की अभूतपूर्व सामर्थ्य रखते हैं।

एक बार कुछ भारतीयों को अमेरिका में कुछ फैक्टरियों की कार्य प्रणाली देखने के लिए भेजा गया। फैक्टरी के एक ऑफीसर ने एक विशेष मशीन की तरफ इशारा करते हुए कहा- अगर आप इस मशीन के बारे में जानना चाहते हैं, तो आपको इसे 75 फुट ऊंची सीढ़ी पर चढ़कर देखना होगा। भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे सबसे उम्रदराज व्यक्ति ने कहा- ठीक है, हम अभी चढ़ते हैं। यह कहकर वह व्यक्ति तेजीसे सीढ़ी पर चढ़ने के लिए आगे बढ़ा। ज्यादातर लोग सीढ़ी की ऊंचाई से डर कर पीछे हट गए तथा कुछ उस व्यक्ति के साथ हो लिये। शीघ्र ही मशीन का निरीक्षण करने के बाद वह शख्स नीचे उतर आया। केवल तीन अन्य लोगों ने ही उस कार्य को अंजाम दिया। यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया थे, जो कि सर एम.वी. के नाम से भी विख्यात थे।

जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, खचाखच भरी एक रेलगाड़ी चली जा रही थी। यात्रियों में अधिकतर अंग्रेज थे। एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री साधारण वेशभूषा में था, इसलिए वहाँ बैठे अंग्रेज उसे मूर्ख और अनपढ़ समझ रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे। पर वह व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं दे रहा था। अचानक उस व्यक्ति ने उठकर गाड़ी की जंजीर खींच दी। तेज रफ्तार में दौड़ती वह गाड़ी तत्काल रुक गई। सभी यात्री उसे भला-बुरा कहने लगे। थोड़ी देर में गार्ड भी आ गया और उसने पूछा- जंजीर किसने खींची है? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- मैंने खींची है। कारण पूछने पर उसने बताया- मेरा अनुमान है कि यहाँ से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है। गार्ड ने पूछा- आपको कैसे पता चला? वह बोला- श्रीमान! मैंने अनुभव किया कि गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आ गया है। पटरी से गूंजने वाली आवाज की गति से मुझे खतरे का आभास हो रहा है। गार्ड उस व्यक्ति को साथ लेकर जब कुछ दूरी पर पहुँचा तो यह देखकर दंग रहा गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए थे और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े थे। दूसरे यात्री भी वहाँ आ पहुँचे। जब लोगों को पता चला कि उस व्यक्ति की सूझबूझ के कारण उनकी जान बच गई है तो वे उसकी प्रशंसा करने लगे। गार्ड ने पूछा- आप कौन हैं? उस व्यक्ति ने कहा- मैं एक इंजीनियर हूँ और मेरा नाम है डॉ. एम. विश्वेश्वरैया। नाम सुनकर सब स्तब्ध रह गए। दरअसल उस समय तक देश में डॉ. विश्वेश्वरैया की ख्याति फैल चुकी थी। लोग उनसे क्षमा मांगने लगे। डॉ. विश्वेश्वरैया का उत्तर था- आप सब ने मुझे जो कुछ भी कहा होगा, मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है। ऐसे महान थे डा. विश्वेश्वरैया
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