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लोक पर्व की प्रासंगिकता

लोक पर्व की प्रासंगिकता

डॉ सच्चिदानान्द प्रेमी
अर्जुन को कर्म योग का उपदेश देते समय श्री कृष्ण ने कहा," अर्जुन !, सूर्य की तरह कर्म योग में निरत हो जाओ,
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥
श्रीमद्भागवत गीता 13/33
कर्म के वास्तविक अधिकारी सूर्य को सर्वप्रथम कर्म का उपदेश ब्रह्मा ने दिया था ।भगवान कृष्ण कहते हैं - मैंने इस अविनाशी योग के बारे में विवस्वान सूर्य को बताया था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इछ्वाकु से कहा । हे अर्जुन ! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस विद्या को योगराज सिंह ने जाना, किंतु उसके बाद यह पृथ्वी लोक में लुप्त प्राय हो गया । तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है ।इसलिए यह पुरातन योग आज मैंने तुमको कहा
है । भगवान के द्वारा दिए गए कर्म योग के उपदेश का सूर्य ने पालन किया । भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया- सूर्य देवता है और संपूर्ण जगत के परम आराध्य हैं । गुप्त काल के पूर्व में ही सूर्योपासकों का एक संप्रदाय बन चुका था । इस संप्रदाय के उपासक अपने उपास्य देव सूर्य को आदिदेव के रूप में मानते
थे ।भौगोलिक दृष्टि से भारत में सूर्योपासना व्यापक थी - मथुरा से मुल्तान तक ,कश्मीर से कोणार्क तक ।उज्जैनी आदि सूर्योपासना के प्रधान केंद्र थे ।अत्रि मुनि की पत्नी ने भी सूर्योपासना की थी ।राजा अश्वपति ने सूर्य की उपासना करके सावित्री देवी को कन्या के रूप में पाया था ।इन्हीं सावित्री यमलोक से अपने पति सत्यवान को वापस लाकर सतीत्व की मर्यादा स्थापित की थी ।अग्नि पुराण के अनुसार विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा जी का जन्म हुआ । ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ ,महर्षि कश्यप से विवस्वान सूर्य की उत्पति हुई । महावीर हनुमान जी ने सूर्य के सानिध्य में रहकर शिक्षा प्राप्त की
थी । कुंती के गर्भ से महावीर कर्ण ने कवच कुंडल के साथ जन्म लिया था । भगवान कृष्ण ने भगवान सूर्य की उपासना करने के बाद सुदर्सन चक्र प्राप्त किया
था । बाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम ने भी आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कर लंका पर विजय प्राप्त की थी । पुराणों के अनुसार उनकी पत्नी संज्ञा से अश्विनी कुमारों का जन्म हुआ जो देवताओं के वैद्य माने गए । अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि के वृद्ध शरीर को युवा शरीर में परिणत कर सुंदरता का वरदान दिया । वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति में सूर्य की किरणों में विटामिन डी प्रचुर मात्रा में मिलता है, इसलिए सुबह की धूप सेवन का विधान है । सुबह समय से उदित होने के साथ समय से अस्त होना इनका कर्म विधान है ।
प्रकृति के साथ उनका संबंध देखा जाए तो बिल्कुल ही सटीक होता है ।सूर्य की रोशनी में ही पौधे अपना भोजन बनाते हैं ।पौधों के भोजन पर हरेक
जीवधारी का जीवन आश्रित होता है ।पौधे नहीं रहे तो कोई जीवधारी नहीं रहेगा, जीव नहीं रहेंगे तो सृष्टि समाप्त हो जाएगी ।इसलिए सूर्य सृष्टि के देवता माने जाते हैं। इसीलिए सूरज की आराधना में जो वस्तुएँ लगती हैं वे सभी प्राकृतिक होती हैं ।बांस की बनी टोकरी,बांस का बना सूप। उनके भोजन में फल प्राकृतिक मूली, गाजर ,नारियल सब प्राकृतिक । भोग-प्रसाद में पकवान प्राकृतिक, गेहूं , चावल सब प्राकृतिक,सूर्य इसीलिए प्रकृति के देवता माने जाते हैं और इन्हीं प्रकृति की वस्तुओं के साथ सुषमा प्रदान कर जगत की रक्षा करते हैं ।उनके प्रकाश से ही पृथ्वी प्रकाशित है, सृष्टि प्रकाशित है।
सूर्य की उपासना आदिकाल से होती जा रही है ।जब किसी देवी-देवता की चर्चा नहीं थी, जब किसी देवी-देवता की मूर्ती नहीं थी ,उस समय सूर्य की पूजा सर्वोपरि थी । इसीलिए प्रकृति के साथ इनका संबंध है ।
प्रायः पूजा दिनभर की ही होती है , कोई भी अनुष्ठान सुबह से शाम तक का ही होता है ।लेकिन इसके विपरीत अस्ताचलगामी सूर्य के अंग से लेकर उदित होते सूर्य को अर्घ देने का विधान है और इसके साथ ही इस व्रत की पूर्ति होती है । इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है ।
सूर्य अपने ससुराल विश्वकर्मा के घर गए थे । विश्वकर्मा संध्या के पिता थे । अपनी बेटी की विदाई के लिए शाम में सूर्य की पूजा की गई जिसमें पकवान से लेकर उपलब्ध फल- फूल की व्यवस्था की गई थी । उसके बाद रात भर विदाई की तैयारी होती रही और सुबह उनकी विदाई की गई । इसीलिए इसी को प्रतीक मानकर संज्ञा का नाम छठी माई दिया गया । उनका पुकारू नाम वहाँ छठी माई रहा होगा ।
इसलिए सायंकालीन अर्घ्य सूर्य के स्वागत के लिए और फिर अगले दिन का प्रातःकालीन अर्घ्य विदाई का परिचायक है ।
समाज में उसी की प्रतिष्ठा होती है जो वेद ,लोकमत एवं परम्परा पर आधारित होता है ।इसी को आधार मानकर इसे लोकपर्व कहा गया है ।
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