मैं कर्ता हूं, ये समझना अज्ञान
(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक
प्रश्न-शास्त्र विहित कर्मों के आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करने के लिय कहने का क्या अभिप्राय है? क्या ऐसे मनुष्य को तत्त्वज्ञान का या कर्मयोग का उपदेश नहीं देना चाहिये?
उत्तर-किसी की बुद्धि में संशय या दुविधा उत्पन्न कर देना ही बुद्धि में भ्रम उत्पन्न करना कहलाता है। अतएव कर्मासक्त मनुष्यों की जो उन कर्मों में, कर्म विधायक शास्त्रों में और अदृष्ट भोगों में आस्तिक बुद्धि है, उस बुद्धि को विचलित करके उनके मन में कर्मों के और शास्त्रों के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर ही उनकी बुद्धि में भ्रम उत्पन्न करना है। अतः यहाँ भगवान् ज्ञानी को कर्मासक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करने के लिये कहकर यह भाव दिखलाते हैं कि उन मनुष्यों को निष्काम कर्म का और तत्त्वज्ञान का उपदेश देते समय ज्ञानी को इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिये कि उसके किसी आचार-व्यवहार और उपदेश से उनके अंतःकरण में कर्तव्य कर्मों के या शास्त्रादि के प्रति किसी प्रकार की अश्रद्धा या संशय उत्पन्न न हो जाय; क्योंकि ऐसा हो जाने से वे जो कुछ शास्त्र विहित कर्मों का श्रद्धापूर्वक सकाम भाव से अनुष्ठान कर रहे हैं, उसका भी ज्ञान के या निष्काम भाव के नाम पर परित्याग कर देंगे। इस कारण उन्नति के बदले उनका वर्तमान स्थिति से भी पतन हो जायगा। अतएव भगवान् के कहने का यहाँ यह भाव नहीं है कि अज्ञानियों को तत्त्वज्ञान का उपदेश नहीं देना चाहिये या निष्काम भाव का तत्त्व नहीं समझाना चाहिये; उनका तो यहाँ यही कहना है कि अज्ञानियों के मन में न तो ऐसा भाव उत्पन्न होने देना चाहिये कि तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिये या तत्त्वज्ञान प्राप्त होने के बाद कर्म अनावश्यक है, न यही भाव पैदा होने देना चाहिये कि फल की इच्छा न हो तो कर्म करने की जरूरत ही क्या है और न इसी भ्रम में रहने देना चाहिये कि फलासक्ति पूर्वक सकामभाव से कर्म कर स्वर्ग प्राप्त कर लेना ही बड़े-से बड़ा पुरुषार्थ है, इससे बढ़कर मनुष्य का और कोई कर्तव्य ही नहीं है। बल्कि अपने आचरण तथा उपदेशों द्वारा उनके अन्तःकरण से आसक्ति और कामना के भावों को हटाते हुए उनको पूर्ववत् श्रद्धापूर्वक कर्म करने में लगाये रखना चाहिये।
प्रश्न-कर्मासक्त अज्ञानी तो पहले से कर्मों में लगे हुए रहते ही है; फिर यहाँ इस कथन का क्या अभिप्राय है कि विद्वान स्वयं कर्मों का भलीभाँति आचरण करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे?
उत्तर-अज्ञानी लोग श्रद्धापूर्वक कर्मों में लगे रहते हैं, यह ठीक है; परन्तु जब उनको तत्त्वज्ञान की या फलासक्ति के त्याग की बात कही जाती है, तब उन बातों का भाव ठीक-ठाक न समझने के कारण वे भ्रम से समझ लेते हैं कि तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिये या फलासक्ति न रहने पर कर्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है, कर्मों का दर्जा नीचा है। इस कारण कर्माें के त्याग में उनकी रुचि बढ़ने लगती है और अन्त में मोहवश विहित कर्मों का त्याग करके आलस्य और प्रमाद के वश हो जाते हैं। इसलिये भगवान् उपर्युक्त वाक्य से ज्ञानी के लिये यह बात कहते हैं कि उसको स्वयं अनासक्त भाव से कर्मों का सांगोपांग आचरण करके सबके सामने ऐसा आदर्श रख देना चाहिये, जिससे किसी की विहित कर्मों में कभी अश्रद्धा और अरुचि न हो सके और वे निष्कामभाव से या कर्तापन के अभिमान से रहित होकर कर्मों का विधिपूर्वक आचरण करते हुए ही अपने मनुष्य-जन्म को सफल बना सकें।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।। 27।।
प्रश्न-सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, इस कथन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण ही बुद्धि, अहंकार, मन, आकाशादि पाँच सूक्ष्म महाभूत्, श्रोत्रादि दस इन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय इन तेईस तत्त्वों के रूप में परिणत होते हैं। ये सब-के-सब प्रकृति के गुण हैं तथा इनमें से अन्तःकरण और इन्द्रियों का विषयों को ग्रहण करना-अर्थात बुद्धि का किसी विषय में निश्चय करना, मन का किसी विषय को मनन करना, कान का शब्द सुनना, त्वचा का किसी वस्तु को स्पर्श करना, आँखों का किसी रूप को देखना, जिव्हा का किसी रस को आस्वादन करना, घ्राण का किसी गन्ध को सूँघना, वाणी का शब्द उच्चारण करना, हाथ का किसी वस्तु को ग्रहण करना-कर्म है। इसलिये उपयुक्त वाक्य से और जो कुछ भी क्रिया होती है, वह सब प्रकार से उपर्युक्त गुणों के द्वारा ही की जाती है, निर्गुण-निराकार आत्मा का उनसे वस्तुतः कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।
प्रश्न-‘अहंकार विमूढात्मा’ कैसे मनुष्य का वाचक है?
उत्तर-प्रकृति के कार्य रूप उपर्युक्त बुद्धि, अहंकार, मन, महाभूत, इन्द्रियाँ और विषय-इन तेईस तत्वों के संघातरूप शरीर में अहंता है-उसमें जो दृढ़ आत्मभाव है, उसका नाम अहंकार है। इस अनादि सिद्धि अहंकार के सम्बन्ध से जिसका अन्तःकरण अत्यन्त मोहित हो रहा है, जिसकी विवेक शक्ति लुप्त हो रही है एवं इसी कारण जो आत्म-अनात्म वस्तु का यथार्थ विवेचन करके अपने को शरीर से भिन्न शुद्ध आत्मा या परमात्मा का सनातन अंश नहीं समझता-ऐसे अज्ञानी मनुष्य का वाचक यहाँ ‘अहंकार विमूढात्मा’ पद है। इसलिये यह ध्यान रहे कि आसक्ति रहित विवेकशील कर्म योग का साधन करने वाले साधक का वाचक ‘अहंकार-विभूढात्मा’ पद नहीं है; क्योंकि उसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित नहीं है, बल्कि वह तो अहंकार का नाश करने की चेष्टा में लगा हुआ है।
प्रश्न-उपर्युक्त अज्ञानी मनुष्य ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मान लेता है, इस कथन का क्या भाव है?
उत्तर-इस कथन से यह भाव दिखलाया गया है कि वास्तव में आत्मा का कर्मों से सम्बन्ध न होने पर भी अज्ञानी मनुष्य तेईस तत्त्वों के इस संगत में आत्माभिमान करके उसके द्वारा किये जाने वाले कर्मों से अपना सम्बन्ध स्थापन करके अपने को उन कर्मों का कर्ता मान लेता है-अर्थात् मैं निश्चय करता हूँ, मैं संकल्प करता हूँ, मैं सुनता हूँ, देखता हूँ, खाता हूँ, पीता हूँ, सोता हूँ, चलता हूँ इत्यादि प्रकार से हरेक क्रिया को अपने द्वारा की हुई समझता है। इसी कारण उसका कर्मों से बन्धन होता है और उसको उन कर्मों का फल भोगने के लिए बार-बार जन्म-मृत्यु रूपी संसार चक्र में घूमना पड़ता है।
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