युगपुरुष पंडित श्रीनाथ मिश्र जी |
पौत्र अनुराग मिश्र की कलम से |
बिहार के कैमूर जिला में पंडित श्री अर्जुन मिश्र जी ,संस्कृत के कर्मकांडीविद्वान ब्राह्मण एवं शिक्षक के तीन पुत्र हुए।
पहले थे पंडित रामकुबेर मिश्र जी जो संस्कृत के विद्वान एवं प्रधानाचार्य के पद पर कार्य कर सेवानिवृत हुए।( 3 बहन ,3 भाई)
दूसरे पुत्र श्रीनाथ मिश्र जी का जन्म कैमूर जिला(शाहाबाद)में उनके प्रमाण पत्र के अनुसार 3 जनवरी 1945 को हुआ,इनके माता का नाम स्व०श्रीमती सरस्वती देवी था।
राजकीयकृत रामदुलारी जगदीप +2 उच्च विद्यालय बहुआरा, चांद प्रखंड, कैमूर से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की,उसके बाद जैन कॉलेज आरा से बी.ए की पढ़ाई पूरी की।
जब श्रीनाथ मिश्र जी 10 वर्ष के थे तभी मां का स्वर्गवास हो गया।
बीए की पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में डेहरी- सासाराम आने जाने का क्रम शुरू हुआ। कलकत्ता के एक सेठ परिवार के घर पूजा करवाने के क्रम में परिचय हुआ ,तब रोहतास इंडस्ट्रीज द्वारा पोषित उस वक्त के सबसे प्रतिष्ठित उच्च विद्यालय डालमियानगर, रोहतास में एक शिक्षक के रूप में पढ़ाने का काम मिला।
बी.ए पास करने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज परीक्षा पास कर वन अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दी।बाद में जयप्रकाश नारायण जी के संपर्क में आने के बाद नौकरी छोड़कर आंदोलन में आ गए।इस दौरान इनका विवाह श्रीमती सोनमती देवी से हुआ जिनसे 3 पुत्र और एक पुत्री हुई ।
बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी जब श्रीनाथ मिश्र जी जेल में थे,पत्नी का स्वास्थ्य गड़बड़ था,तभी उनके दूसरे पुत्र जिनकी आयु मात्र1 वर्ष थी, जेल प्रार्थना पर छुटकर आने में देरी हुई और आते आते समय और पैसा के अभाव में पुत्र का निधन हो गया।अति सामाजिक होने के कारण परिवार को कई बार कष्ट उठाना पड़ा परंतु पत्नी ने उनका पूरा सहयोग किया।
इस तरह संघर्ष के दिनों में आंदोलन में कई बार बार बार कई बार जेल गए। बाद में ट्यूशन आदि पढ़ाना शुरू किए,और डालमियानगर रोहतास को अपना केंद्र बनाया।
सन 1963- 64 में संघ की शाखा से जुड़े। उस समय डेहरी में सूद जी, उमेश जी ,द्वारिका जी ,डोमन जी,सुवंश पाठक ,केदार जी , आदि इनके मित्र रहे।
सन 1967 में डेहरी में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर का कार्यक्रम हुआ था।उस दौरान उनका सानिध्य और साथ में प्रवास करने का मौका मिला।
गुरुजी के सामने संघ प्रचारक बनने की इच्छा जाहिर की गुरु जी ने बोला, तुम शादीशुदा हो शादी है इसलिए गृहस्थ रहते हुए जीवन भर संघ का कार्य करोगे ऐसा वादा करो।
इसी के बाद श्रीनाथ जी का जीवन पूरा संघ के कार्यों को समर्पित रहा। बाद में आंदोलन से आने के बाद सरकारी शिक्षक के रूप में कार्य करने शुरू किए।
26 वर्षों तक लगातार डालमियानगर में स्कूल में पढ़ाते रहे। इस दौरान संघ कार्य और सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे। भारत स्काउट एंड गाइड के नेशनल कॉउंसेलर के रूप में देश विदेश का भ्रमण किया। अंग्रेजी अर्थशास्त्र विषय में मूर्धन्य शिक्षक थे।वर्ष 2005 में पटना जिले के शिक्षक के रूप में रिटायर होने के बाद संघ के द्वारा राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्री का दायित्व मिला। बिहार एवं झारखंड संगठन के सभी जगहों पर संगठन को मजबूत करने का लगातार प्रयास जारी रहा।
बाद में श्रीनाथ जी को शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के संयोजक के रूप में दायित्व भी मिला। वर्ष 2014 में हृदय संबंधी रोग का पता चला,उसी समय न्यूरोलॉजी संबंधी पार्किंसन नाम की बीमारी हो गई। 2015 में दिल्ली के एम्स में परम पूज्य सरसंघचालक जी के दिशा निर्देश पर हार्ट की सर्जरी हुई। बाद में स्वस्थ होकर पुनः संघ कार्य में लग गए। उसके पश्चात संघ के सम्पर्क टोली के सदस्य के रूप में दायित्व निर्वहन किया। कहते थे संघ का स्वयंसेवक बैठता नहीं या तो लड़ता है या तो लगा रहता है।
"गिरकर उठना उठकर चलना यह क्रम है संसार का कर्मवीर को फर्क न पड़ता किसी जीत या हार का"
उन्होंने जीवन में संबंधों के दायित्वों के निर्वहन का बहुत ध्यान रखा। कभी भी व्यक्तिगत परेशानी को अपने सामाजिक कार्यों पर हावी नहीं होने दिया। संघर्ष से कभी हार नहीं माने। अंतिम क्षण तक संघ कार्यालय गुरुदक्षिणा हो इसकी चिंता की ,कहते थे हमलोगों का गुरुद्वारा संघ कार्यालय है- राष्ट्राय स्वाहा इदं न मम्
एक आदर्श शिक्षक कुशल संगठनकर्ता एक अनुशाषित स्वयंसेवक एवं एक विचारक के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे। सूर्यपूजा परिषद एवं चाणक्य विचार मंच के सदस्य एवं सार्वभौम पर्यावरण संरक्षण मंच के संस्थापक अध्यक्ष रहे। 16 अगस्त 2022 की शाम पटना स्थित अपने आवास पर उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली।
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