जीव कर्मवश, ईश्वर योगमाया से होते प्रकट
(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक
प्रश्न-यहाँ ‘स्वाम्’ विशेषण के सहित ‘प्रकतिम्’ पद किसका तथा ‘आत्ममायया’ किसका वाचक है और इन दोनों में क्या भेद है?
उत्तर-भगवान् की शक्तिरूपा जो मूल प्रकृति है, जिसका वर्णन नवम अध्याय के सातवें और आठवें श्लोकों में किया गया है और जिसे चैदहवें अध्याय में ‘महद्वह्म’ कहा गया है, उसी ‘मूल प्रकृति’ का वाचक यहाँ ‘स्वाम्’ विशेषण के सहित ‘प्रकृतिम्’ पद है तथा भगवान् अपनी जिस योग शक्ति से नाना प्रकार के रूप धारण करके लोगों के सम्मुख प्रकट होते हैं और जिसमें छिपे रहने के कारण लोग उनको पहचान नहीं सकते तथा सातवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में जिसको योगमाया के नाम से कहा है-उसका वाचक यहाँ ‘आत्ममायया’ पद है। ‘मूल प्रकृति’ को अपने अधीन करके अपनी योगशक्ति के द्वारा ही भगवान् अवतीर्ण होते हैं।
मूल प्रकृति संसार को उत्पन्न करने वाली है और भगवान् की यह योगमाया उनकी अत्यन्त प्रभावशालिनी, ऐश्वर्यमयी शक्ति है। यही इन दोनों का भेद है।
प्रश्न-मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ, इस कथन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-इससे भगवान् ने साधारण जीवों से अपने जन्म की विलक्षणता दिखलायी है। अभिप्राय यह है कि जैसे जीव प्रकृति के वश में होकर अपने-अपने कर्मानुसार अच्छी-बुरी योनियों में जन्म धारण करते हैं और सुख-दुख भोग करते हैं, उस प्रकार का मेरा जन्म नहीं है। मैं अपनी प्रकृति का अधिष्ठाता होकर स्वयं ही अपनी योगमाया से समय-समय पर दिव्य लीला करने के लिये यथावश्यक रूप धारण किया करता हूँ मेरा वह जन्म स्वतंत्र और दिव्य होता है, जीवों की भाँति कर्म वश नहीं होता।
प्रश्न-साधारण जीवों के जन्मने-मरने और भगवान् के प्रकट और अन्तर्धान होने में क्या अन्तर है?
उत्तर-साधारण जीवों के जन्म और मृत्यु उनके कर्मों के अनुसार होते हैं, उनके इच्छानुसार नहीं होते। उनको माता के गर्भ में रहकर कष्ट भोगना पड़ता है। जन्म के समय वे माता की योनि से शरीर सहित निकलते हैं। उसके बाद शनैः-शनैः वृद्धि को प्राप्त होकर उस शरीर का नाश होने पर मर जाते हैं। पुनः कर्मानुसार दूसरी योनि में जन्म धारण करते हैं किन्तु भगवान् का प्रकट और अन्तर्धान होना इससे अत्यन्त विलक्षण है और वह उनकी इच्छा पर निर्भर है; वे चाहे जब, चाहे जहाँ, चाहे जिस रूप में प्रकट और अन्तर्धान हो सकते हैं; एक क्षण में छोटे से बड़े बन जाते हैं और बड़े से छोटे बन जाते हैं एवं इच्छानुसार रूप का परिवर्तन कर लेते हैं। इसका कारण यह है कि वे प्रकृति से बँधे नहीं हैं, प्रकृति ही उनकी इच्छा का अनुगमन करती है। इसलिये जैसे ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान्् ने पहले विश्व रूप धारण कर लिया, फिर उसे छिपाकर वे चतुर्भुज रूप से प्रकट हो गये, उसके बाद मनुष्य रूप हो गये-इसमें जैसे एक रूप प्रकट होना और दूसरे रूप को छिपा लेना, जन्मना-मरना नहीं है-उसी प्रकार भगवान् का किसी भी रूप में प्रकट होना और उसे छिपा लेना जन्मना-मरना नहीं है, केवल लीला मात्र है।
प्रश्न-भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म तो माता देवकी के गर्भ से साधारण मनुष्यों की भाँति ही हुआ होगा, फिर लोगों के जन्म में और भगवान् के प्रकट होने में क्या भेद रहा?
उत्तर-ऐसी बात नहीं है। श्रीमद्भागवत का वह प्रकरण देखने से इस शंका का अपने-आप ही समाधान हो जायगा। वहाँ बतलाया गया है कि उस समय माता देवकी ने अपने सम्मुख शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए चतुर्भुज दिव्य देव रूप से प्रकट भगवान् को देखा और उनकी स्तुति की। फिर माता देवकी की प्रार्थना से भगवान् ने शिशुरूप धारण किया। अतः उनका जन्म साधारण मनुष्यों की भाँति माता देवकी के गर्भ से नहीं हुआ, वे अपने-आप ही प्रकट हुए थे। जन्मधारण की लीला करने के लिये ऐसा भाव दिखलाया गया था मानो साधारण मनुष्यों की भाँति भगवान् दस महीनों तक माता देवकी के गर्भ में रहे समय पर उनका जन्म हुआ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। 7।।
प्रश्न-‘यदा’ पद का दो बार प्रयोग करके क्या भाव दिखलाया गया है?
उत्तर-भगवान् के अवतार का कोई निश्चित समय नहीं होता कि अमुक महीने में और अमुक दिन भगवान् प्रकट होंगे तथा यह भी नियम नहीं है कि एक युग में कितने किस रूप में भगवान् प्रकट होंगे। इसी बात को स्पष्ट करने के लिये यहाँ ‘यदा’ पद का दो बार प्रयोग किया गया है। अभिप्राय यह है कि धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि के कारण जब जिस समय भगवान् अपना प्रकट होना आवश्यक समझते हैं, तभी प्रकट हो जाते हैं।
प्रश्न-वह धर्म की हानि और पाप की वृद्धि किस प्रकार की होती है, जिसके होने पर भगवान् अवतार धारण करते हैं?
उत्तर-किस प्रकार की धर्म-हानि और पाप-वृद्धि होने पर भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, उसका स्वरूप वास्तव में भगवान् ही जानते हैं; मनुष्य इसका पूर्व निर्णय नहीं कर सकता पर अनुमान से ऐसा माना जा सकता है कि ऋषि-कल्प, धार्मिक, ईश्वर प्रेमी, सदाचारी पुरुषों तथा निरपराधी, निर्बल प्राणियों पर बलवान् और दुराचारी मनुष्यों का अत्याचार बढ़ जाना तथा उसके कारण लोगों में सद्गुण और सदाचार का अत्यन्त ह्यास होकर दुर्गुण और अर्धम की वृद्धि का स्वरूप है। सत्ययुग में हिरण्यकशिपु के शासन में जब दुर्गुण और दुराचारों की वृद्धि हो गयी, निरपराधी लोग सताये जाने लगे, लोगों के ध्यान, जप, तप, पूजा, पाठ, यज्ञ, दानादि शुभ कर्म एवं उपासना बलात्कार से बंद कर दिये गये, देवताओं को मार-पीटकर उनके स्थानों से निकाल दिया, प्रहलाद जैसे भक्तों को बिना अपराध नाना प्रकार के कष्ट दिये गये, उसी समय भगवान् ने नृसिंह रूप धारण किया था और भक्त प्रहलाद का उद्धार करके धर्म की स्थापना की थी। इसी प्रकार दूसरे अवतारों में भी पाया जाता है।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag
0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com