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भगवान के जन्म व कर्म की दिव्यता

भगवान के जन्म व कर्म की दिव्यता

(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)

रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यकत्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। 9।।

प्रश्न-भगवान् का जन्म दिव्य है, इस बात को तत्त्व से समझना क्या है?

उत्तर-सर्वशक्तिमान्, पूर्णब्रह्म परमेश्वर वास्तव में जन्म और मृत्यु से सर्वथा अतीत हैं। उनका जन्म जीवों की भाँति नहीं है, वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करके अपनी दिव्य लीलाओं के द्वारा उनके मन को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये, दर्शन, स्पर्श और भाषणादि के द्वारा उनको सुख पहुँचाने के लिये, संसार में अपनी दिव्य कीर्ति फैलाकर उसके श्रवण, कीर्तन और स्मरण द्वारा लोगों को पापों का नाश करने के लिये तथा जगत् में पापाचारियों का विनाश करके धर्म की स्थापना करने के लिये जन्म-धारण की केवल लीला मात्र करते हैं। उनका वह जन्म निर्दोष और अलौकिक है, जगत् का कल्याण करने के लिये ही भगवान् इस प्रकार मनुष्यादि के रूप में लोगों के सामने प्रकट होते हैं; उनका वह विग्रह प्राकृत उपादानों से बना हुआ नहीं होता-वह दिव्य, चिन्मय, प्रकाशमान, शुद्ध और अलौकिक होता है; उनके जन्म में गुण और कर्म-संस्कार हेतु नहीं होेते; वे माया के वश में होकर जन्म धारण नहीं करते, किन्तु अपनी प्रकृति के अधिष्ठाता होकर योगशक्ति से मनुष्यादि के रूप में केवल लोगों पर दया करके ही प्रकट होते हैं-इस बात को भलीभाँति समझ लेना अर्थात् इसमें किंचित मात्र भी असम्भावना और विपरीत भावना न रखकर पूर्ण विश्वास करना और साकार रूप में प्रकट भगवान् को साधारण मनुष्य न समझकर सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी साक्षात् सच्चिदान्दनघन पूर्ण ब्रह्म परमात्मा समझना भगवान् के जन्म को तत्त्व से दिव्य समझना है। इस अध्याय के छठे श्लोक में यही बात समझायी गयी है। सातवें अध्याय के चैबीसवें और पचीसवें श्लोकांे में और नवें अध्याय के ग्यारहवें तथा बारहवें श्लोकों में इस तत्त्व को न समझकर भगवान् को साधारण मनुष्य समझने वालों की निन्दा की गयी है एवं दसवें अध्याय के तीसरे श्लोक में इस तत्त्व को समझने वाले की प्रशंसा की गयी है।

जो पुरुष इस प्रकार भगवान् के जन्म की दिव्यता को तत्त्व से समझ लेता है, उसके लिये भगवान् का एक क्षण का वियोग भी असह्य हो जाता है। भगवान् में परम श्रद्धा और अनन्य-प्रेम होने के कारण उसके द्वारा भगवान् को अनन्य चिन्तन होता रहता है।

प्रश्न-भगवान् के कर्म दिव्य हैं, इस बात को तत्त्व से समझना क्या है?

उत्तर-भगवान् सृष्टि-रचना और अवतार-लीलादि जितने भी कर्म करते हैं, उनमें उनका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं है; केवल लोगों पर अनुग्रह करने के लिये ही वे मनुष्यादि अवतारों में नाना प्रकार के कर्म करते हैं। भगवान् अपनी प्रकृति द्वारा समस्त कर्म करते हुए भी उन कर्मों के प्रति कर्तृत्वभाव न रहने के कारण वास्तव में न तो कुछ भी करते हैं और न उनके बन्धन में पड़ते हैं; भगवान् की उन कर्मों के फल में किंचित मात्र भी स्पृहा नहीं होती। भगवान् के द्वारा जो कुछ भी चेष्टा होती है, लोकहितार्थ ही होती है; उनके प्रत्येक कर्म में लोगों का हित भरा रहता है। वे अनन्त कोटि ब्राह्माण्डों के स्वामी होते हुए भी सर्व साधारण के साथ अभिमान रहित दया और प्रेम पूर्ण समता का व्यवहार करते हैं। जो कोई मनुष्य जिस प्रकार उनको भजता है, वे स्वयं उसे उसी प्रकार भजते हैं; अपने अनन्य भक्तों का योग क्षेम भगवान् स्वयं चलाते हैं, उनको दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं और भक्ति रूपी नौका पर बैठे हुए भक्तों का संसार समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने के लिये स्वयं उनके कर्णधार बन जाते हैं। इस प्रकार भगवान् के समस्त कर्म आसक्ति, अहंकार और कामनादि दोषों से सर्वथा रहित निर्मल और शुद्ध तथा केवल लोगों का कल्याण करने एवं नीति, धर्म, शुद्ध पे्रेम और भक्ति आदि का जगत् में प्रचार करने के लिये ही होते हैं; इन सब कर्मों को करते हुए भी भगवान् का वास्तव में उन कर्मों से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, वे उनसे सर्वथा अतीत और अकर्ता हैं-इस बात को भलीभाँति समझ लेना, इसमें किंचित मात्र भी असम्भावना या विपरीत भावना न रहकर पूर्ण विश्वास हो जाना ही भगवान् के कर्मों को तत्त्व से दिव्य समझना है।

इस प्रकार जान लेने पर उस जानने वाले के कर्म भी शुद्ध और अलौकिक जो जाते हैं-अर्थात् फिर वह भी सबके साथ दया, समता, धर्म, नीति, विनय और निष्काम प्रेमभाव का बर्ताव करता है।

प्रश्न-भगवान् के जन्म और कर्म दोनों की दिव्यता को समझ लेने से भगवान् की प्राप्ति होती है या इनमें से किसी एक की दिव्यता के ज्ञान से भी हो जाती है?

उत्तर-दोनों में किसी एक की दिव्यता जान लेने से ही भगवान् की प्राप्ति हो जाती है; फिर दोनों की दिव्यता समझ लेने से हो जाती है; इसमें तो कहना ही क्या है।

प्रश्न-इस प्रकार जानने वाला पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, मुझे ही प्राप्त होता है-इस कथन का क्या भाव है?

उत्तर-वह पुनर्जन्म को न प्राप्त होकर किस भाव को प्राप्त होता है; उसकी कैसी स्थिति होती है-इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिये भगवान् ने यह कहा है कि वह मुझको (भगवान् को) ही प्राप्त होता है और जो भगवान् को प्राप्त हो गया उसका पुनर्जन्म नहीं होता, यह सिद्धान्त ही है।

प्रश्न-यहाँ जन्म-कर्मों की दिव्यता जानने वाले को शरीर त्याग के बाद भगवान् की प्राप्ति होने की बात कही गयी’ तो क्या उसे इसी जन्म में भगवान् नहीं मिलते उत्तर-इस जन्म में नहीं मिलते, ऐसी बात नहीं है। वह भगवान् के जन्म-कर्मों की दिव्यता को जिस समय पूर्णतया समझ लेता है, वस्तुतः उसी समय उसे भगवान् प्रत्यक्ष मिल जाते हैं; पर मरने के बाद उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह भगवान् के परम धाम को चला जाता है-यह विशेष भाव दिखलाने के लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि वह शरीर त्याग के बाद मुझे ही प्राप्त होता है।
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