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सर्वत्र भगवान देखने वाला मन्मय

सर्वत्र भगवान देखने वाला मन्मय

(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्ावभागताः ।। 10।।

प्रश्न-‘वीतरागभयक्रोधाः’ पद कैसे पुरुषों का वाचक है और यहाँ इस विशेषण के प्रयोग का क्या भाव है?

उत्तर-आसक्ति का नाम राग है; किसी प्रकार के दुःख की सम्भावना से जो अन्तःकरण में घबड़ाहट होती है, उस विकार का नाम ‘भय’ है; और अपना अपकार करने वाले पर तथा नीति विरुद्ध या अपने मन के विरुद्ध बर्ताव करने वाले पर होने वाले उत्तेजनापूर्ण भाव का नाम ‘क्रोध’ है; इन तीनों विकारों का जिन पुरुषों में सर्वथा अभाव हो गया हो, उनका वाचक ‘वीतरागभयक्रोधाः’ पद है। भगवान् के दिव्य जन्म और कर्मों का तत्त्व समझ लेने वाले मनुष्य का भगवान् को छोड़कर उनकी किसी भी पदार्थ में जरा भी आसक्ति नहीं रहती; भगवान् का तत्त्व समझ लेने से उनको सर्वत्र भगवान् का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है और सर्वत्र भगवद् बुद्धि हो जाने के कारण वे सदा के लिये सर्वथा निर्भय हो जाते हैं; उनके साथ कोई कैसा भी बर्ताव क्यों न करे, उसे वे भगवान् की इच्छा से हुआ समझते हैं और संसार की समस्त घटनाओं को भगवान् की लीला समझते हैं-अतएव किसी भी निमित्त से उनके अन्तःकरण में क्रोध का विकार नहीं होता। इस प्रकार भगवान् के जन्म और कर्मों का तत्त्व जानने वाले भक्तों में भगवान् की दया से सब प्रकार के दुर्गुणों का सर्वथा अभाव होता है, यही भाव दिखलाने के लिये यहाँ ‘वीतरागभयक्रोधाः’ विशेषण का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न-‘मन्मयाः’ का क्या भाव है?

उत्तर-भगवान् में अनन्य प्रेम हो जाने के कारण जिनको सर्वत्र एक भगवान्-ही-भगवान् दीखने लगे जाते हैं, उनका वाचक ‘मन्मयाः’ पद है। इस विशेषण का प्रयोग करके यहाँ यह भाव दिखलाया गया है कि जो भगवान् के जन्म और कर्मों को दिव्य समझकर भगवान् को पहचान लेते हैं उन ज्ञानी भक्तों का भगवान् में अनन्य प्रेम हो जाता है; अतः वे निरन्तर भगवान् में तन्मय हो जाते हैं और सर्वत्र भगवान् को ही देखते हैं।

प्रश्न-‘मामुपाश्रिताः’ का क्या भाव है?

उत्तर-जो भगवान् की शरण ग्रहण कर लेते हैं, सर्वथा उन पर निर्भर हो जाते हैं, सदा उनमें ही सन्तुष्ट रहते हैं, जिनका अपने लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता और जो सब कुछ भगवान् का समझकर उनकी आज्ञा का पालन करने के उद्देश्य से उनकी सेवा के रूप में ही समस्त कर्म करते हैं-ऐसे पुरुषों का वाचक ‘मामुपाश्रिताः’ पद है। इस विशेषण का प्रयोग करके यहाँ यह भाव दिखलाया गया है कि भगवान् के ज्ञानी भक्त सब प्रकार से उनके शरणापन्न होते हैं, वे सर्वथा उन्हीं पर निर्भर रहते हैं, शरणागति के समस्त भावों का उनमें पूर्ण विकास होता है।

प्रश्न-‘ज्ञानतपसा’ पद का अर्थ आत्मज्ञान रूप तप न मानकर भगवान् के जन्म-कर्मों का ज्ञान मानने का क्या अभिप्राय है और उस ज्ञान तप से पवित्र होकर भगवान् के स्वरूप को प्राप्त हो जाना क्या है?

उत्तर-यहाँ सांख्य योग का प्रसंग नहीं है, भक्ति का प्रकरण है तथा पूर्व श्लोक में भगवान के जन्म-कर्मों को दिव्य समझने का फल भगवान की प्राप्ति बतलाया गया है; उसी के प्रमाण में यह श्लोक है। इस कारण यहाँ ‘ज्ञान तपसा’ पद में ज्ञान का अर्थ आत्मज्ञान न मानकर भगवान् के जन्म-कर्मों को दिव्य समझ लेना रूप ज्ञान ही माना गया है। इस ज्ञान रूप तप के प्रभाव से मनुष्य का भगवान् में अनन्य प्रेम हो जाता है, उसके समस्त पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं, अंतःकरण में सब प्रकार के दुर्गुणों का सर्वथा अभाव हो जाता है और समस्त कर्म भगवान् के कर्मों की भाँति दिव्य हो जाते हैं तथा वह कभी भगवान् से अलग नहीं होता, उसको भगवान् सदा ही प्रत्यक्ष रहते हैं-यही उन भक्तों का ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर भगवान् के स्वरूप को प्राप्त हो जाना है।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। 11।।

प्रश्न-जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ-इस कथन का क्या अभिप्राय है? 
उत्तर-इससे भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि मेरे भक्तों के भजन प्रकार भिन्न-भिन्न होते हैं। अपनी-अपनी भावना के अनुसार भक्त मेरे पृथक-पृथक रूप मानते हैं और अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार मेरा भजन-स्मरण करते हैं, अतएव मैं भी उनको उनकी भावना के अनुसार उन-उन रूपों में ही दर्शन देता हूँ। श्री विष्णुरूप की उपासना करने वालांे को श्रीविष्णु रूप में, श्रीरामरूप की उपासना करने वालों को श्रीरामरूप में, श्रीकृष्ण रूप की उपासना करने वालों को श्रीकृष्ण रूप में, श्रीशिवरूप की उपासना करने वालों को श्रीशिवरूप में, देवीरूप की उपासना करने वाले को देवीरूप में और निराकार सर्वव्यापी रूप में मिलता हूँ; इसी प्रकार जो मत्स्य, कच्छप, नृसिंह, वामन आदि अन्यान्य रूपों की उपासना करते हैं-उनको उन-उन रूपों में दर्शन देकर उनका उद्धार कर देता हूँ। इसके अतिरिक्त वे जिस प्रकार जिस-जिस भाव से मेरी उपासना करते हैं, मैं उनके उस-उस प्रकार और उस-उस भाव का ही अनुसरण करता हूँ। जो मेरा चिन्तन करता है उसका मैं चिन्तन करता हूँ जो मेरे लिये व्याकुल होता है उसके लिये मैं भी व्याकुल हो जाता हूँ, जो मेरा वियोग सहन नहीं कर सकता मैं भी उसका वियोग नहीं सहन कर सकता। जो मुझे अपना सर्वस्व अर्पण कर देता है मैं भी उसे अपना सर्वस्व अर्पण कर देता हूँ। जो ग्वाल-बालों की भाँति मुझे अपना सखा मानकर मेरा भजन करते हैं उनके साथ मैं मित्र के जैसा व्यवहार करता हूँ। जो नन्द यशोदा की भाँति पुत्र मानकर भजन करते हैं, उनके साथ पुत्र के जैसा बर्ताव करके उनका कल्याण करता हूँ। इसी प्रकार रुक्मिणी की तरह पति समझकर भजने वालों के साथ पति-जैसा, हनुमान् की भाँति स्वामी समझकर भजने वालों के साथ स्वामी-जैसा और गोपियों की भाँति माधुर्यभाव से भजने वालों के साथ प्रियतम जैसा बर्ताव करके मैं उनका कल्याण करता हूँ और उनको दिव्य लीला-रस का अनुभव कराता हूँ।
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