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मांगलिक कार्यों के प्रारम्भ की एकादशी

मांगलिक कार्यों के प्रारम्भ की एकादशी

(पं. आर.एस. द्विवेदी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
दीपावली में जैसे दीपों की पंक्ति सजती है उसी तरह यह पर्व भी कई कड़ियों को जोड़ता है। पांच दिन तक तो लगातार त्योहार मनाए जाते हैं और 11 दिन बाद देवोत्थानी एकादशी होती है। इसके बाद पूर्णिमा को गंगा स्नान का पर्व होता है।

देवोत्थान एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। दीपावली के बाद आने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी अथवा देवउठान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देव शयन करते हैं और इस कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु, जो क्षीरसागर में विश्राम कर रहे थे, चार माह उपरांत जागे थे। विष्णु जी के शयन काल के चार मासों में विवाहादि मांगलिक कार्यों का आयोजन करना निषेध है। हरि के जागने के बाद ही इस एकादशी से सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं।

कहा जाता है कि चातुर्मास के दिनों में एक ही जगह रुकना जरूरी है, जैसा कि साधु-संन्यासी इन दिनों किसी एक नगर या बस्ती में ठहरकर धर्म प्रचार का काम करते हैं। देवोत्थान एकादशी को यह चातुर्मास पूरा होता है और पौराणिक आख्यान के अनुसार इस दिन देवता भी जाग उठते हैं। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सभी देवता और उनके अधिपति विष्णु सो जाते हैं। फिर चार माह बाद देवोत्थान एकादशी को जागते हैं। देवताओं का शयन काल मानकर ही इन चार महीनों में कोई विवाह, नया निर्माण या कारोबार आदि बड़ा शुभ कार्य आरंभ नहीं होता।

इस प्रतीक को चुनौती देते या उपहास उड़ाते हुए युक्ति और तर्क पर निर्भर रहने वाले लोग कह उठते हैं कि देवता भी कभी सोते हैं क्या? श्रद्धालु जनों के मन में भी यह सवाल उठता होगा कि देवता भी क्या सचमुच सोते हैं और उन्हें जगाने के लिए उत्सव आयोजन करने होते हैं, पर वे एकादशी के दिन सुबह तड़के ही विष्णु और उनके सहयोगी देवताओं का पूजन करने के बाद शंख, घंटा, घड़ियाल बजाने लगते हैं। पारंपरिक आरती और कीर्तन के साथ वे गाने लगते हैं: ‘उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओ देवा।’ देवताओं को जगाने, उन्हें अंगुरिया चटखाने और अंगड़ाई लेकर जाग उठने का आह्वान करने के उपचार में भी संदेश छुपा है। स्वामी नित्यानंद सरस्वती के अनुसार चार महीने तक देवताओं के सोने और इनके जागने पर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी पर उनके जागने का प्रतीकात्मक तात्पर्य है। प्रतीक वर्षा के दिनों में सूर्य की स्थिति और ऋतु प्रभाव बताने, उस प्रभाव से अपना सामंजस्य बिठाने का संदेश देते हैं। वैदिक वांग्मय के अनुसार सूर्य सबसे बड़े देवता हैं। उन्हें जगत की आत्मा भी कहा गया है। हरि, विष्णु, इंद्र आदि नाम सूर्य के पर्याय हैं। वर्षा काल में अधिकांश समय सूर्य देवता बादलों में छिपे रहते हैं। इसलिए ऋषि ने गाया है कि वर्षा के चार महीनों में हरि सो जाते हैं। फिर जब वर्षा काल समाप्त हो जाता है तो वे जाग उठते हैं या अपने भीतर उन्हें जगाना होता है। बात सिर्फ सूर्य या विष्णु के सो जाने और उस अवधि में आहार-विहार के मामले में खास सावधानी रखने तक ही सीमित नहीं है। इस अनुशासन का उद्देश्य वर्षा के दिनों में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों, उनके कारण प्रायः फैलने वाली मौसमी बीमारियों और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के कारण स्वास्थ्य अक्सर गड़बड़ाता रहता है। निजी जीवन में स्वास्थ्य संतुलन का

ध्यान रखने के साथ ही यह चार माह की अवधि साधु-संतों के लिए भी विशेष दायित्वों का तकाजा लेकर आती है। घूम-घूम कर धर्म-अध्यात्म की शिक्षा देने लोक कल्याण की गतिविधियों को चलाते रहने वाले साधु-संत इन दिनों एक ही जगह पर रुक कर साधना और शिक्षण करते हैं। एक समय भगवान नारायण से लक्ष्मी जी ने कहा, ‘हे नाथ! अब आप दिन-रात जागा करते हैं और सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अतः आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा।’ लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्कराए और बोले, ‘देवी! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और खासकर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा। विष्णु ने कहा मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनंदपूर्वक आयोजित करेंगे, उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूंगा।’

इस दिन तुलसी और शालिग्राम के विवाह का आयोजन करने का भी विधि-विधान है। तुलसी के वृक्ष और शालिग्राम की यह शादी सामान्य विवाह की तरह पूरे धूमधाम से की जाती है। देवता जब जागते हैं तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दम्पतियों के कन्या नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें। इस दिन सारे घर को लीप-पोतकर साफ करना चाहिए तथा स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चैक पूरकर भगवान विष्णु के चरणों को चित्रित करना चाहिए। एक ओखली में गेरू से चित्र बनाकर फल, पकवान, मिष्ठान, बेर, सिंघाड़े, ऋतुफल और गन्ना उस स्थान पर रखकर परात अथवा डलिया से ढक दिया जाता है तथा एक दीपक भी जला दिया जाता है। रात्रि को परिवार के सभी वयस्क सदस्य देवताओं का भगवान विष्णु सहित विधिवत पूजन करने के बाद प्रातःकाल भगवान को शंख, घंटा-घड़ियाल आदि बजाकर जगाते हैं। कृषि प्रधान देश भारत में पर्व और तयोहार फसल चक्र से भी जुड़ते हैं। खरीफ की प्रमुख फसल धान के तैयार होने पर करवा चैथ और दीपावली में चूरा-लइया को प्रसाद रूप में लक्ष्मी-गणेश को अर्पित किया जाता है। इसी क्रम में गन्ने की फसल तैयार हो जाती है। उसका रस इसी तिथि के बाद भरपूर मीठा होता है। तालाब में सिंघाड़ा भी इसी समय स्वाद से भरपूर होता है। प्रवोधि की एकादशी पर गन्ना और सिंघाड़े से पूजा करने का प्रावधान इसीलिए किया गया है।
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