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भगवान ने प्रकट होने का बताया कारण

भगवान ने प्रकट होने का बताया कारण

(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।। 8।।

प्रश्न-‘साधु’ शब्द यहाँ कैसे मनुष्यों का वाचक है और उनका परित्राण या उद्धार करना क्या है?

उत्तर-जो पुरुष अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि समस्त सामान्य धर्मों का तथा यज्ञ, दान, तप एवं अध्यापन, प्रजा पालन आदि अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मों का भलीभाँति पालन करते हैं; दूसरों का हित करना ही जिनका स्वभाव है; जो सद्गुणों के भण्डार और सदाचारी हैं तथा श्रद्धा और प्रेमपूर्वक भगवान् के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीलादि के श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करने वाले भक्त हैं-उनका वाचक यहाँ ‘साधु’ शब्द है। ऐसे पुरुषों पर जो दुष्ट-दुराचारियों के द्वारा भीषण अत्याचार किये जाते हैं-उन अत्याचारों से उन्हें सर्वथा मुक्त कर देना, उनको उत्तम गति प्रदान करना, अपने दर्शन आदि से उनके समस्त संचित पापों का समूल विनाश करके उनका परम कल्याण कर देना, अपनी दिव्य लीला का विस्तार करके उनके श्रवण, मनन, चिन्तन और कीर्तन आदि के द्वारा सुगमता से लोगों के उद्धार का मार्ग खोल देना आदि सभी बातें साधु पुरुषों का परित्राण अर्थात् उद्धार करने के अन्तर्गत हैं।

प्रश्न-यहाँ ‘दुष्कृताम्’ पद कैसे मनुष्यों का वाचक है और उनका विनाश करना क्या है?

उत्तर-जो मनुष्य निरपराध, सदाचारी और भगवान् के भक्तों पर अत्याचार करने वाले हैं; जो झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार आदि दुर्गुण और दुराचारों के भण्डार हैं, जो नाना प्रकार से अन्याय करके धन का संग्रह करने वाले तथा नास्तिक हैं; भगवान् और वेद-शास्त्रों का विरोध करना ही जिनका स्वभाव हो गया है-ऐसे आसुर स्वभाव वाले दुष्ट पुरुषों का वाचक यहाँ ‘दुष्कृताम्’ पद है। ऐसे दुष्ट प्रकृति के दुराचारी मनुष्यों की बुरी आदत छुड़ाने के लिये या उन्हें पापों से मुक्त करने के लिये उनको किसी प्रकार का दण्ड देना, युद्ध के द्वारा या अन्य किसी प्रकार से उनका इस शरीर से सम्बन्ध विच्छेद करना या करा देना आदि सभी बातें उनका विनाश करने के अन्तर्गत हैं।

प्रश्न-भगवान् तो परम दयालु हैं; वे उन दुष्टों को समझा बुझाकर उनके स्वभाव का सुधार क्यों नहीं कर देते, उनको इस प्रकार का दण्ड क्यों देते हैं?

उत्तर-उनको दण्ड देने और मार डालने में (आसुर शरीर से उनका सम्बन्ध-विच्छेद कराने में) भी भगवान् की दया भरी है, क्योंकि उस दण्ड और मृत्यु द्वारा भी भगवान् उनके पापों का नाश ही करते हैं। भगवान् के दण्ड-विधान के सम्बन्ध में यह कभी न समझना चाहिये कि उससे भगवान् की दयाुलता में किसी प्रकार की जरा-सी भी त्रुटि आती है। जैसे-अपने बच्चे के हाथ, पैर आदि किसी अंग में फोड़ा हो जाने पर माता-पिता पहले औषध का प्रयोग करते हैं; पर जब यह मालूम हो जाता है कि अब औषध से इसका सुधार न होगा, देर करने से इसका जहर दूसरे अंगों में भी फैल जायगा, तब वे तुरंत ही अन्य अंगों को बचाने के लिये उस दूषित हाथ-पैर आदि का आपरेशन करवाते हैं और आवश्यकता होने पर उसे कटवा भी देते हैं। इसी प्रकार भगवान् भी दुष्टों की दुष्टता दूर करने के लिये पहले उनको नीति के अनुसार दुर्योधन को समझाने की भाँति समझाने की चेष्टा करते हैं, दण्ड का भय भी दिखलाते हैं; पर जब इससे काम नहीं चलता, उनकी दुष्टता बढ़ती ही जाती है, तब उनको दण्ड देकर या मरवाकर उनके पापों का फल भुगताते हैं अथवा जिनके पूर्व संचित कर्म अच्छे होते हैं, किन्तु किसी विशेष निमित्त से या कुसंग के कारण जो इस जन्म में दुराचारी हो जाते हैं, उनको अपने ही हाथों मारकर भी मुक्त कर देते हैं। इन सभी क्रियाओं में भगवान् की दया भरी रहती है।

प्रश्न-धर्म की स्थापना करना क्या है?

उत्तर-स्वयं शास्त्रानुकूल आचरण कर, विभिन्न प्रकार से धर्म का महत्त्व दिखलाकर और लोगों के हृदयों में प्रवेश करने वाली अप्रतिम प्रभाव शालिनी वाणी के द्वारा उपदेश-आदेश देकर सबके अन्तःकरण में वेद, शास्त्र, परलोक, महापुरुष और भगवान् पर श्रद्धा उत्पन्न कर देना तथा सद्गुणों में और सदाचारों में विश्वास तथा प्रेम उत्पन्न करवाकर लोगों में इन सबको दृढ़तापूर्वक भलीभाँति धारण करा देना आदि सभी बातें धर्म की स्थापना के अन्तर्गत हैं।

प्रश्न-साधुओं का परित्राण, दुष्टों का संहार और धर्म की स्थापना-इन तीनों की एक साथ आवश्यकता होने पर ही भगवान् का अवतार होता है या किसी एक या दो निमित्तों से भी हो सकता है?

उत्तर-ऐसा नियम नहीं है कि तीनों ही कारण एक साथ उपस्थित होने पर भगवान् अवतार धारण करें; किसी भी एक या दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिये भी भगवान् अवतार धारण कर सकते हैं।

प्रश्न-भगवान् तो सर्वशक्तिमान् हैं, वे बिना अवतार लिये भी तो ये सब काम कर सकते हैं; फिर अवतार की क्या आवश्यकता है?

उत्तर-यह बात सर्वथा ठीक है कि भगवान् बिना ही अवतार लिये अनायास ही सब कुछ कर सकते हैं और करते भी हैं, किन्तु लोगों पर विशेष दया करके अपने दर्शन, स्पर्श और भाषणादि के द्वारा सुगमता से लोगों को उद्धार का सुअवसर देने के लिये एवं अपने प्रेमी भक्तों को अपनी दिव्य लीलादि का आस्वादन कराने के लिये भगवान् साकार रूप से प्रकट होते हैं। उन अवतारों में धारण किये हुए रूप का तथा उनके गुण, प्रभाव, नाम, माहात्म्य और दिव्य कर्मों का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करके लोग सहज ही संसार-समुद्र से पार हो सकते हैं। यह काम बिना अवतार के नहीं हो सकता।

प्रश्न-मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ इस कथन का क्या भाव है? 
उत्तर-इससे भगवान् ने यह दिखलाया है कि मैं प्रत्येक युग में जब-जब युगधर्म की अपेक्षा धर्म की हानि अधिक हो जाती है तब-तब आवश्यकता-अनुसार बार-बार प्रकट होता हूँ; एक युग में एक बार ही होता हूँ-ऐसा कोई नियम नहीं है।
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