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अर्जुन को स्वधर्म का उपदेश

अर्जुन को स्वधर्म का उपदेश

(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक

प्रश्न-‘स्वधर्मः‘ पद के साथ ‘विगुणः’ विशेषण के प्रयोग का क्या भाव है?

उत्तर-‘विगुणः‘ पद गुणों की कमी का द्योतक है। क्षत्रिय का स्वधर्म युद्ध करना, दुष्टों को दण्ड देना आदि है, उसमें अहिंसा और शान्ति आदि गुणांें की कमी मालूम होती है। इसी तरह वैश्य के ‘कृषि’ आदि कर्मों में भी हिंसा आदि दोषों की बहुलता है, इस कारण ब्राह्मणों के शान्तिमय कर्मों की अपेक्षा वे विगुण यानी गुणहीन हैं एवं शूद्र के कर्म वैश्यों और क्षत्रिय की अपेक्षा भी निम्न श्रेणी के हैं। इसके सिवा उन कर्मों के पालन में किसी अंग का छूट जाना अनुष्ठान की कमी है। उपर्युक्त प्रकार से स्वधर्म में गुणों की और अनुष्ठान की कमी रहने पर भी वह परधर्म की अपेक्षा कल्याणप्रद है, यही भाव दिखलाने के लिये ‘स्वधर्मः‘ के साथ विगुणः’ विशेषण दिया गया है।

प्रश्न-अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है, इस कथन का क्या अभिप्राय है?

उत्तर-इससे यह दिखलाया गया है कि यदि स्वधर्म पालन में किसी तरह की आपत्ति न आवे और जीवन भर मनुष्य उसका पालन कर ले तो उसे अपने भावानुसार स्वर्ग की या मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है, इसमें तो कहना ही क्या है; किसी प्रकार की आपत्ति आने पर वह अपने धर्म से न डिगे और उसके कारण उसका मरण हो जाय तो वह मारण भी उसके लिये कल्याण करने वाला हो जाता है। इतिहासोें और पुराणों में ऐसे बहुत उदाहरण मिलते हैं, जिनमें स्वधर्म पालन के लिये मरने वालों का एवं मरणपर्यन्त कष्ट स्वीकार करने वालों का कल्याण होने की बात कही गयी है।

राजा दिलीप ने क्षात्र धर्म का पालन करते हुए एक गौ के बदले अपना शरीर सिंह को समर्पित करके अभीष्ट प्राप्त किया; राजा शिव ने शरणागतरक्षा रूप स्वधर्म का पालन करने के लिये एक कबूतर के बदले में अपने शरीर का मांस बाज को देकर मरना स्वीकार किया और उससे उनके अभीष्ट की सिद्धि हुई; प्रहलाद ने भगवभक्ति रूप स्वधर्म का पालन करने के लिये अनेकों प्रकार के मृत्यु के साधनों को सहर्ष स्वीकार किया और इससे उनका परम कल्याण हो गया। इसी प्रकार के और भी बहुत से उदाहरण मिलते हैं। महाभारत में कहा गया है-

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्

धर्मं त्यजेज्वीवितस्यापि हेतोः।

नित्यो धर्मः सुखदुः खे त्वनित्ये

जीबो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः।।

अर्थात् ‘मनुष्य को किसी भी समय काम से, भय से, लोभ से जीवन रक्षा के लिये भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य हैं, तथा जीव नित्य है और जीवनका हेतु अनित्य है।’

इसलिये मरण-संकट उपस्थित होने पर भी मनुष्य को चाहिये कि वह हँसते-हँसते मृत्यु को वरण कर ले पर स्वधर्म का त्याग किसी भी हालत में न करे। इसी में उसका सब प्रकार से कल्याण है।

प्रश्न-दूसरे का धर्म भय देने वाला है, इस कथन का क्या अभिप्राय है?

उत्तर-इससे यह दिखलाया है कि दूसरे के धर्म का पालन यदि सुखपूर्वक होता हो तो भी वह भय देने वाला है।

उदाहरणार्थ-शूद्र और वैश्य यदि अपने से उच्च वर्ण वालों के धर्म का पालन करने लगें तो उच्च वर्णें से अपनी पूजा कराने के कारण और उनकी वृ़ित्तच्छेद करने के दोष के कारण वे पाप के भागी बन जाते हैं और फलतः उनको नरक भोगना पड़ता है, इसी प्रकार ब्राह्मण-क्षत्रिय यदि अपने से हीन वर्ण वालों के धर्म का अवल्मबन कर लें तो उनका उस वर्ण से पतन हो जाता है एवं बिना आपित्तकाल के दूसरों की वृत्तिच्छेद के पाप का भी फल उन्हें भोगना पड़ता है। इसी तरह आश्रम-धर्म तथा अन्य सब धर्मों के विषय में समझ लेना चाहिये। अतएव किसी भी मनुष्य को अपने कल्याण के लिये पर धर्म के ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। दूसरे का धर्म देखने में चाहे कितना ही गुण सम्पन्न क्यों न हो, वह जिसका धर्म है, उसी के लिये है; दूसरे के लिये तो वह भय देेने वाला ही है, कल्याणकारक नहीं।

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।

अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।। 36।।

प्रश्न-इस श्लोक में अर्जुन के प्रश्न का क्या अभिप्राय है?

उत्तर-भगवान् ने पहले यह बात कही थी कि यज्ञ करने वाले बुद्धिमान् मनुष्य के मन को भी इन्द्रियाँ बलात्कार से विचलित कर देती हैं। व्यवहार में भी देखा जाता है कि बुद्धिमान, विवेकशील मनुष्य प्रत्यक्ष में और अनुमान से पापों का बुरा परिणाम देखकर विचारद्वारा उनमें प्रवृत्त होना ठीक नहीं समझता, अतः वह इच्छापूर्वक पापकर्म नहीं करता; तथापि बलात्कार से उसके द्वारा रोगी से कुपथ्य-सेवन की भाँति पाप-कर्म बन जाते हैं। इसलिये उपर्युक्त प्रश्न के द्वारा अर्जुन भगवान् से इस बात का निर्णय कराना चाहिते हैं कि इस मनुष्य को बलात्कार से पापों में लगाने वाला कौन है? क्या स्वयं परमेश्वर ही लोगों को पापों में नियुक्त करते हैं, जिसके कारण वे उनके हट नहीं सकते, अथवा प्रारब्ध के कारण बाध्य होकर उन्हें पाप करने पड़ते हैं, अथवा इसका कोई दूसरा ही कारण है?

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमु˜वः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। 37।।

प्रश्न-‘कामः’ और ‘क्रोधः’-इन दोनों पदों के साथ-साथ दो बार ‘एषः‘ पद के प्रयोग का क्या भाव है तथा ‘रजोगुण-समु˜वः’ विशेषण का सम्बन्ध किस पद के साथ है? 
उत्तर-चैंतीसवें श्लोक में यह बात कही गयी थी कि प्रत्येक इन्द्रियों के विषयों में रहने वाले राग और द्वेष ही इस मनुष्य को लूटने वाले डाकू हैं; उन्हीं दोनों के स्थूल रूप काम-क्रोध हैं-यह भाव दिखलाने के लिये तथा इन दोनों में भी ‘काम’ प्रधान है, क्योंकि यह राग का स्थूल रूप है और इसी से ‘क्रोध’ की उत्पत्ति होती है। यह दिखलाने के लिये ‘कामः’ और ‘क्रोधः’ इन दोनों पदों के साथ ‘एषः’ पद का प्रयोग किया गया है। काम की उत्पत्ति राग से होती है, इस कारण ‘रजोगुण समु˜वः’ विशेषण ‘कामः’ पद से ही सम्बन्ध रखता है।
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