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कर्मफल के आश्रय का त्याग ही आसक्ति है

कर्मफल के आश्रय का त्याग ही आसक्ति है

(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान फीचर सेवा)
रामायण अगर हमारे जीवन में मर्यादा का पाठ पढ़ाती है तो श्रीमद् भागवत गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। द्वापर युग के महायुद्ध में जब महाधनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो गये, तब उनके सारथी बने योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अपने मित्र अर्जुन का मोह दूर किया और कर्तव्य का पथ दिखाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने छोटे-छोटे राज्यों में बंटे भारत को एक सशक्त और अविभाज्य राष्ट्र बनाया था। गीता में गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। श्री जयदयाल गोयन्दका ने यह जनोपयोगी कार्य किया। उन्होंने श्रीमद भागवत गीता के कुछ गूढ़ शब्दों को जन सामान्य की भाषा में समझाने का प्रयास किया है ताकि गीता को जन सामान्य भी अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतार सके। -प्रधान सम्पादक

अनाश्रिताः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स संन्यासी च योगी च न निरगिन्र्न चाक्रियः।। 1।।

प्रश्न-यहाँ कर्म फल के आश्रय का त्याग बतलाया गया, आसक्ति के त्याग की कोई बात इसमें नहीं आयी, इसका क्या कारण है?

उत्तर-जिस पुरुष की भोगों में या कर्मों में आसक्ति होती है, वह कर्म फल के आश्रय का सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। आसक्ति होने पर स्वाभाविक ही कर्म फल की कामना होती है। अतएव कर्मफल के आश्रय का जिसमें त्याग है, उसमें आसक्ति का त्याग भी समझ लेना चाहिये। प्रत्येक स्थान पर सभी शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ करता। ऐसे स्थलों पर उसी विषय में अन्यत्र कही हुई बात का अध्याहार कर लेना चाहिये। जहाँ फल का त्याग बतलाया जाय परन्तु आसक्ति का भी त्याग समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ आसक्ति का त्याग कहा जाय पर फल-त्याग की बात न हो। वहाँ फल का त्याग भी समझ लेना चाहिए।

प्रश्न-कर्म फल के आश्रय को त्यागने का क्या भाव है

उत्तर-स्त्री, पुत्र, धन, मान और बड़ाई आदि इस लोक के और स्वर्ग सुखादि पर लोक के जितने भी भोग हैं, उन सभी का समावेश ‘कर्मफल’ में कर लेना चाहिये। साधारण मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है, किसी न किसी फल का आश्रय लेकर ही करता है। इसलिये उसके कर्म उसे बार-बार जन्म-मरण के चक्कर में गिराने वाले होते हैं। अतएव इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों को अनित्य, क्षण भंगुर और दुःखों में हेतु समझकर, समस्त कर्मों में ममता, आसक्ति और फलेच्छा का सर्वथा त्याग कर देना ही कर्म फल के आश्रय का त्याग करना है।

प्रश्न-करने योग्य कर्म कौन से हैं और उन्हें कैसे करना चाहिये?

उत्तर-अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुसार जितने भी शास्त्र विहित नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, दान, तप, शरीर निर्वाह सम्बन्धी तथा लोक सेवा आदि के लिये किये जाने वाले शुभ कर्म हैं, सभी करने योग्य कर्म हैं। उन सबको यथाविधि तथा यथा योग्य आलस्य रहित होकर, अपनी शक्ति के अनुसार कर्तव्य बुद्धि से उत्साहपूर्वक सदा करते रहना चाहिये।

प्रश्न-उपर्युक्त पुरुष संन्यासी भी है और योगी भी हैं, इस कथन का क्या भाव है?

उत्तर-इससे भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि ऐसा कर्मयोगी पुरुष समस्त संकल्पों का त्यागी होता है और उस यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हो जाता है जो सांख्य योग और कर्मयोग दोनों ही निष्ठाओं का चरम फल है, इसलिये वह ‘संन्यासित्व’ और ‘योगित्व’ दोनों ही गुणों से युक्त माना जाता है।

प्रश्न-‘न निरग्निः’ का क्या भाव है?

उत्तर-अग्नि का त्याग करके संन्यास-आश्रम ग्रहण कर लेने वाले पुरुष को ‘निरग्नि’ कहते हैं। यहाँ ‘न निरग्निः’ कहकर भगवान् यह भाव दिखलाते हैं कि जिसने अग्नि को त्याग कर संन्यास-आश्रम का तो ग्रहण कर लिया है, परन्तु जो ज्ञान योग (सांख्य योग) के लक्षणों से युक्त नहीं है, वह वस्तुतः संन्यासी नहीं है, क्योंकि उसने केवल अग्नि का ही त्याग किया है, समस्त क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान का त्याग तथा ममता, आसक्ति और देहाभिमान का त्याग नहीं किया।

प्रश्न-‘न च अक्रियः’ का क्या भाव है?

उत्तर-समस्त क्रियाओं का सर्वथा त्याग करके ‘ध्यानस्थ’ हो जाने वाले पुरुष को ‘अक्रिय’ कहते हैं। यहाँ ‘न च अक्रियः’ से भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि जो सब क्रियाओं का त्याग करके ध्यान लगाकर तो बैठ गया है, परन्तु जिसके अन्तःकरण में अहंता, ममता, राग, द्वेष, कामना आदि दोष वर्तमान हैं, वह भी वास्तव में योगी नहीं है, क्योंकि उसने भी केवल बाहरी क्रियाओं का ही त्याग किया है। ममता, अभिमान, आसक्ति, कामना और क्रोध आदि का त्याग नहीं किया।

प्रश्न-जिस पुरुष ने अग्नि का सर्वथा त्याग करके संन्यास आश्रम ग्रहण कर लिया है और जिसमें ज्ञान योग (सांख्य योग) के समस्त लक्षण भलीभाँति प्रकट हैं, क्या वह संन्यासी नहीं है?

उत्तर-क्यों नहीं? ऐसे ही महापुरुष तो आदर्श संन्यासी हैं। इसी प्रकार के संन्यासी महात्माओं का महत्त्व प्रकट करने के लिये ही तो ज्ञान योग के लक्षणों का जिनमें विकास होता है, उन अन्य आश्रम वालों को भी संन्यासी कहकर उनकी प्रशंसा की जाती है। इसके अतिरिक्त उन्हें संन्यासी बतलाने का और स्वारस्य ही क्या हो सकता है?

प्रश्न-इसी प्रकार समस्त क्रियाओं का त्याग करके जो पुरुष निरन्तर ध्यानस्थ रहता है तथा जिनके अन्तःकरण में ममता, राग, द्वेष और काम-क्रोधादि का सर्वथा अभाव हो गया है, वह सर्व संकल्पों का संन्यासी भी क्या योगी नहीं है?

उत्तर-ऐसे सर्व संकल्पों के त्यागी महात्मा ही तो आदर्श योगी हैं।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।

नह्यसंन्यस्त संकल्पों योगी भवति कश्चन।। 2।।

प्रश्न-जिसको ‘संन्यास’ कहते हैं उसी को ‘योग’ जान, इस कथन का क्या अभिप्राय है?

उत्तर-यहाँ ‘संन्यास’ शब्द का अर्थ है-शरीर, इन्द्रिय और मन द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन का भाव मिटाकर केवल परमात्मा में ही अभिन्न-भाव से स्थित हो जाना। यह सांख्य योगी की पराकाष्ठा है। तथा ‘योग’ शब्द का अर्थ है-ममता, आसक्ति और कामन के त्याग द्वारा होने वाली ‘कर्म योग’ की पराकाष्ठा नैष्कम्र्य-सिद्धि। दोनों में ही संकल्पों का सर्वथा अभाव हो जाता है और सांख्य योगी जिस परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होता है, कर्मयोगी भी उसी को प्राप्त होता है। इस प्रकार दोनों में ही समस्त संकल्पों का त्याग है और दोनों ही एक ही फल हैं; इसलिये ऐसा कहा गया है।

प्रश्न-यहाँ ‘संकल्प’ का अर्थ है और उसका ‘संन्यास’ क्या है? 
उत्तर-ममता और राग-द्वेष से संयुक्त सांसारिक पदार्थों का चिन्तन करने वाली जो अन्तःकरण की वृत्ति है, उसको ‘संकल्प’ कहते हैं? इस प्रकार की वृत्ति का सर्वथा अभाव कर देना ही उसका ‘संन्यास’ है।हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

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