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मैं हूॅं फौजी

मैं हूॅं फौजी

मैं हूॅं फौज का एक फीट जवान,
करता में देश की सुरक्षा जवान।
डयूटी में नहीं लापरवाहीं करता,
दिन व रात यह डयूटी में करता।।


हजार रुपए मुझे रोज़ है मिलता,
फ़ौज में सबको मौज यह रहता।
थोड़ा बहुत यें ग़म भी हमें रहता,
इसके लिए यह रम हमें मिलता।।


ये ज़िंदगी थोड़ी रिस्की है हमारी,
इसी के लिए विस्की मिलें प्यारी।
खानें के बाद सभी को यें फ्रूट है,
और मरने के बाद हमें सैल्यूट है।।


पहनने के लिए सबको यें ड्रैस है,
पर ड्रैस में सबको जरुरी प्रेस है।
सुबह रोज़ाना पी. टी. परेड होती,
और वार्निंग के लिए सीटी होती।।


चलने के लिए ख़राब रूठ होता,
और पहनने को हमें बूट मिलता।
खाना हमें यें रिफ्रेशमेन्ट मिलता,
गलती करें तो पनिशमेंट मिलता।।


जीतें जी सभी को यें रहता टेंशन,
और मरने के बाद मिलता पेंशन।
मैं ‌हूॅं फौजी और मन का हूॅं मोजी,
अच्छा लगें तो इसे शेयर करें ‌जी।।


रचनाकार गणपत लाल उदय, अजमेर राजस्थान
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