पटना नगर निगम के मतदाताओं से अपील!
वर्ष 1912 में जब बिहार एक अलग राज्य बना, तो पटना को इसकी राजधानी बनायी गयी. इसके बाद शहर का विस्तार भी तेजी से होने लगा. पश्चिमी पटना का विकास और विस्तार इस इलाके में सरकारी दफ्तरों के खुलने के बाद हुआ।
1916 में पटना म्युनिसिपैलिटी का नाम पटना सिटी म्युनिसिपैलिटी रखा गया. बाद में पटना के नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के मकसद से 15 अगस्त, 1952 को पटना म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट के तहत पटना नगर नियम कायम हुआ. पटना वाटर वर्क्स कमेटी इसी तारीख से पटना वाटर बोर्ड के नाम से वजूद में आयी.
म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्षों में खान बहादुर मु. इस्माइल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, नवाबजादा सैयद मुहम्मद मेंहदी रिजवी, रायसाहब श्रीनारायण अरोड़ा प्रमुख रहे.
पटना नगर निगम के महापौर में नवाबजादा मेंहदी हसन और रामेश्वर प्रसाद गोलवारा सबसे अधिक समय तक इस पद पर रहे. श्री कृष्ण नंदन सहाय, चन्द्र मोहन प्रसाद, यमुना प्रसाद जैसे व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति भी इस पद पर रहे। श्री कृष्ण नंदन सहाय के कार्यकाल में अखिल भारतीय महापौर सम्मेलन पटना सिटी स्थित गांधी सरोवर मंगल तालाब के जय प्रकाश उद्यान में आयोजित हुआ था।
पटना नगर निगम की राजनीतिक पाठशाला से पढ़कर उपमहापौर होकर बिहार से लेकर केंद्र तक में मंत्री हुए रामकृपाल यादव और नंदकिशोर यादव जैसे राजनेता। उपमहापौर रहे संतोष मेहता और जियाउल्ला खां को कौन भूल सकता है! पटना नगर निगम में अपने कार्यकाल के हीरा रहे स्व.देवता प्रसाद चौधरी व स्व.मन्ना लाल व्यास के योगदान को भी नहीं भुलाया जा सकता है।
बीते समय में पटना नगर निगम क्षेत्र में काफी बदलाव आया है. क्षेत्रों के साथ साथ जनसंख्या के साथ साथ होल्डिंग में भी इजाफा हुआ है और निगम की आय भी बढ़ी है. बिहार की राजधानी होने की वजह से केंद्र से राज्य सरकार तक इसके विकास के लिए तत्पर होकर खर्च करती है. निगम भी अपने बजट से खर्च करती है. साथ ही विधायक व सांसद निधि का पैसा अलग से विकास में खर्च होता है. इसके बावजूद यह शहर देश के अन्य राज्यों की राजधानी का मुकाबला करने में विफल साबित हुआ है। शहर का यथोचित विकास नहीं हो सका है. दरअसल निर्वाचित जनप्रतिनिधि क्षेत्र के विकास से ज्यादा खुद के विकास में लगे दिखाई देते हैं.
नगर निगम के 72 वार्डों में 36 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित है. इस बार महापौर का पद भी महिलाओं के लिए आरक्षित हुआ है. आमतौर पर यह देखा गया है कि महिला आरक्षित पद पर निर्वाचित होकर वे अपने प्रतिनिधि के माध्यम से कार्य करती हैं. ये प्रतिनिधि उनके पति या पुत्र ही होते हैं. यही स्थिति मुखियाओं में भी देखने को मिलता है. यह अनैतिक है और कानून सम्मत भी नहीं है. इससे महिलाएं स्वतंत्र होकर निर्णय नहीं ले पाती हैं. जिससे महिलाओं को आरक्षण देने की अवधारणा ही ख़त्म हो जाती है. जनता में इसका गलत संदेश भी जाता है.
पटना नगर निगम के मतदाताओं से पटना जिला सुधार समिति अपील करती है कि मतदान अवश्य करें और सोच समझकर पढ़े लिखे सुयोग्य जनप्रतिनिधि को चुने। ऐसे प्रतिनिधि का चुनाव करें जो प्राचीन पटना शहर के ऐतिहासिकता को बचाते हुए वार्डों का विकास कर सके तथा जनता को स्वच्छ पीने के जल के साथ साफ सफाई के साथ शहर नागरिकों को स्वस्थ और सम्मानपूर्ण जीवन जीने में सहयोग करे।
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