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भारतीय सेना का सिपाही हूॅं

भारतीय सेना का सिपाही हूॅं

तन से भले ही काला हूॅं लेकिन मन का मैं सच्चा हूॅं,
भारत का नागरिक व भारतीय सेना का सिपाही हूॅं।
नहीं हिन्दू हूॅं न मुस्लिम हूॅं नहीं सिख न ही ईसाई हूॅं,
एक हाथ यह तिरंगा और दूसरे में बन्दूक रखता हूॅं।।


गगन को पिता समझता हूॅं धरा को माता मानता हूॅं,
राष्ट्र हित में सेवाऍं देकर सबका आशीर्वाद लेता हूॅं।
निर्बल को में नहीं छेड़ता दुश्मन को नहीं छोड़ता हूॅं,
मुझे मिल जाऍं देश का शत्रु उसको दबोच लेता हूॅं।।


करता हूॅं मैं वक्त का इंतजार साजिश नहीं रचता हूॅं,
लिया है प्रशिक्षण इसका शिकार करना जानता हूॅं।
नीले-नीले अम्बर से वर्षा बनकर बरसना चाहता हूॅं,
देश-सेवा के साथ-साथ साहित्यिक सेवा करता हूॅं।।


सरहदों की ड्यूटियां मैं सतर्कता से करता रहता हूॅं,
वतन सुरक्षित रहें हमारा इसलिए जागता रहता हूॅं।
सीना तानकर रहता हूॅं एवं स्वाभिमानी से जीता हूॅं,
सीमा पे चौकीदार बनके पहरेदारी करता रहता हूॅं।।


आजादी के दीवानों एवं शहीदों को शीश नवाता हूॅं,
सच पूछो तो उन वीरों को श्रृद्धा से पुष्प चढ़ाता हूॅं।
उनकेे माता-पिता वीरांगनाओं को प्रणाम करता हूॅं,
देश-प्रेम की मदिरा पीकर खुशी-खुशी से जीता हूॅं।।


रचनाकार- गणपत लाल उदय अजमेर राजस्थान
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