स्मृतियों में सारंगी बजती।
आकुल मन के द्वार खड़ा होलुगड़ी लिए फकीरा
भीतर-भीतर क्या होता है
बजता नहीं मंजीरा।
सन्नाटे मे गुम- सुम सी
कुछ है खोई लगती ।
कौनी में चिरगुनिया कलरव
कब -तक हँसे -हँसावे,
रात सुलावे और भोर होते
हठ मान जगावे।
उतर रही आभा में जआने
तृष्णा - सी सजती।
जीवन के चौराहे मिलकर भी
अनमिल रहते ,
आतप,शीत ,वृष्टि का संगी
बनकर ही रहते।
काल चक्र कीअथक सूचिका
अपने धुन चलती।
रामकृष्ण
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