आफत का परकाला
आफत का परकाला जाड़ा
आफत का परकाला
रोज सबेरे से सूरज पर
लगता कुहरा जाला।
ठिठुरन की बूटी में कोई
जादू मिले न टोना
घाम सेरायी परसे आशा
मन भर खाली दोना।
हाथ पाँव कठमूरत मानो
मार गया हो पाला।
चिड़ियों के कलरव ने जैसे
अलकोहल पी ली हो
पत्तों में फिर भी मौसम से
लड़ जिनगी जी ली हो।
जिनके अपने नहीं घोसले
कितने रहे वेयाला।
रुग्णालय की दीवारों पर
थिरक न पाता मन है
कितने बाल देह के माथे
लिखा असह क्रंदन है।
सड़कों पर लेकिन पसरा है
फर सन्नाटे वाला।
रामकृष्ण
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