" दान नगर "
एक दिन घूमते घूमते एक जगह पर पहुँच गया,नाम था उसका दान नगर वहाँ पर मैं रुक गया ।
एक जन से पूछा नाम दान नगर क्यों है बताये?
वह बोला साहब पहले आप अंदर तो आए ।
सर्दियों के दिन थे कड़ाके की ठंड पड़ रही थी,
मैंने टोपी, ग्लवज और जैकेट पहनी हुई थी ।
जैसे ही अंदर प्रवेश किया बड़ा सा बोर्ड पाया,
वस्त्र दान है महादान उस पर लिखा था भाया।
सभी मुझे घूर घूर कर देख रहे थे,
जैसे मुझसे मेरे कपडे माँग रहे थे।
मैंने अपने ग्लव्स और टोपी उतार दी,
उसके बाद भी उनकी नज़र नही हटी।
मैंने जैकेट भी खोल कर वहाँ रख दी,
तब जाकर उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
वे खुश हो गए मैं आगे बढ़ गया,
फिर एक बोर्ड मुझे मिल गया ।
जिस पर लिखा था अन्न दान महादान है,
अन्नदान करना आप की शान हैं।
मेरे दोनों हाथों में थे खाने पीने के सामान,
मैंने वहीं सब छोड़ दिये और कर दिया अन्नदान।
वह भी खुश हो गए
मैं आगे बढ़ गया,
फिर से एक बोर्ड की तरफ ध्यान खींच गया ।
उस पर लिखा था रक्तदान है महादान,
मैं लेट गया और कर दिया रक्तदान ।
वह लोग भी खुश हो गए।
मेरे कदम आगे बढ़ गये।
लेकिन आगे जो बोर्ड लगा था,
उस पर नेत्रदान महादान लिखा था ।
वह पढ़ मेरा माथा चकरा गया ,
मैं तो तुरंत वहां से भाग गया।
ऐसा भागा जैसे मेरे पीछे कोई भूत लग गया,
जान बचाकर सीधा मैं घर पर आ गया।
स्वरचित हास्य व्यंग✍सुमित मानधना 'गौरव', सूरत
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