हवा चल रही है बर्फीली
जलते कहीं अलाव नहीं
चौराहों के सून मुहाने
आखिर कहीं तनाव नहीं।
खुलते नहीं द्वार गलियों के
देर -देर तक रहते मौन ,
ठिठुरे हाथों से हिम्मत भर
छू सकता पत्थर भी कौन।
लगता है इस मौसम में है
वैसा बहुत बनाव नहीं।
सस्ती सब्जी ने किसान का
श्रमसीकर सस्ता कर डाला
लागत का आधा भी आमद
हो न सका ,केवल विष प्याला
आशा की परिछाई आई
लेकिन जरा झुकाव नहीं।
ठंढक कम होने की आशा
अंतहीन सी कथा हुई
दुर्बलता के अंग- अंग की
अनबूझी-सी व्यथा हुई।
मौसम की बेरुखी हवा मेंं
अनचाहे भटकाव नहीं।
डा रामकृष्ण
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