कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो
( आचार्य राधामोहन मिश्र माधव )
आओ हम कुछ बतिआएंँ भी
कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो।
सन्नाटा है पसरा मन में
कुछ मैं ढूँढूँ, कुछ तुम ढूँढ़ो।
चीड़े-चीड़ी चहचहा रहे
सस्मित सी हैं सुमन-कलियाँ।
गौएँ रंभा रहीं रह-रह,
सूनी न रहीं गूची-गलियाँ।
फिर हम क्यों दुबके-दुबके से
कुछ मैं बोलूँ, कुछ तुम बोलो।
पछुआ सर-सर शुरु हो गयी
विरह और कुछ गुरु हो गयी।
जिनगी रीती और भरी है
तेज-मद्धिम सी आँच जुड़ी है।
बिना किए कुछ होने को ना,
कुछ मैं करुँ, कुछ तुम करो।
जंतर-मंतर जादू-टोना
हँसता है जग बना खिलौना।
ऊपर -ऊपर मत देखो
भीतर भी है बना डिठौना।
किन भावों में सब मग्न हो रहे,
कुछ मैं बिफरुँ, कुछ तुम बिफरो।
ढुलमुल ढुलमुल हम ढले जा रहे,
मौन मधुर कुछ कहे जा रहे।
चुपियाते उन सैनों को
अब बनें मुखर हम कुछ खोलें।
सरकते पल को अब न सहो,
कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो।
-- माधव
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