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ठंढी तोहर बहार आईल बा

ठंढी तोहर बहार आईल बा

ठंढी तोहर त बहार आईल बा ,
जईसे काँधा डोली कहाँर आईल बा ,
ठंढी तोहर त बहार आईल बा ।
गर्मी से त सबके राहत दिहल ,
सबके ठिठुरईलऽ तूँ जाड़ में ।
सुईटर कोट जैकेट पहिनवलऽ, 
तबहुँ कम्पन्न बा अभीं हाड़ में ।।
का जानी कब केकरा का करबऽ, 
का तोहरा मनवाँ में समाईल बा 
ठंढी तोहर त बहार आईल बा ।
लड़िकन के त छूअबऽ नाहिएँ, 
चाहे कतनों रहिहें उ त उघारे ।
बुढ़वन के तूँ त छोड़बऽ नाहिएँ ,
लगबऽ जीवने से तू त उबारे ।।
कतना बुढ़वन के ऊपर भेजलऽ, 
तोहरो मनवाँ बड़ा बउराईल बा ,
ठंढी तोहर त बहार आईल बा ।
गरीब असहाय के ना सोचलऽ ,
कईसे जीयत बा उहो संसार में ।
आगे बा एगो ओकरो त सहारा ,
दिने राते तापत बा ऊ जाड़ में ।।
ढेर तूँ तड़पवलऽ ढेर तपवलऽ ,
जाड़ से खुशी सब भूलाईल बा ,
ठंढी तोहर त बहार आईल बा ।
ठंढी से स्कूलो तूँ बंद करवलऽ ,
कोई के ठंढिए लागे के डर से ।
पढ़ल खेलल मुश्किल भईल बा ,
कबहूँ निकलत नईखे घर से ।।
अबहूओं से त अब रहम तू कर ,
तोहरा डरहीं सभे त डेराईल बा ,
ठंढी तोहर त बहार आईल बा ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश 
डुमरी अड्डा 
छपरा ( सारण )
बिहार  ।
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