विश्व हिन्दी दिवस पर कुछ दोहे
'कबिरा'घर खेली पली,होकर बड़ी निहाल ।
ठुमक-ठुमक चलने लगी,'सूरा'की तुक-ताल।।
'मीरा' होकर के मगन,धरै न धरती पाँव ।
नज़र न लग जाए कहीं,दी आँचल की छाँव।।
'दास नरोत्तम' ही नहीं,'रहिमन'आदि प्रमाण।
'खुसरो' ने डाली यहाँ,है हिन्दी में जान ।।
'भूषण'की भाषा बनी,तेज धार तलवार।
गाया 'तुलसीदास' ने, घर-घर पाया प्यार।।
सहज सरल भाषा वही,जो देती रस घोल।
अंतस स्वयं टटोलिए,हिन्दी- हिन्दी बोल ।।
हिन्दी का पर्याय हैं, और दूसरा कौन ।
देतीं सब सम्मान हैं,भाषाएं हो मौन ।।
यात्रा तो लंबी रही,किन्तु न मानी हार ।
सब भाषाओं का रहा,संस्कृत ही आधार।।
सात समुन्दर पार तक,पहुंच गयी है धाक।
हिन्दी का जादू चला ,बगल रहे सब झांक ।।
हिन्दी वाले लोग कुछ,होते बडे़ कृतघ्न ।
अवसर मिलता है जहाँ,अंग्रेजी संग जश्न।।
हिन्दी हिन्दुस्तान की,भाषा है अनमोल ।
देख प्रगति सब देश ने,द्वार दिए हैं खोल।।
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~जयराम जय
'पर्णिका,बी-11/1,कृष्ण विहार,आवास विकास, कल्याणपुर, कानपुर-208017(उ प्र)
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