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सामाजिक परिवेश में राजनीति की असंवेदनशीलता

सामाजिक परिवेश में राजनीति की असंवेदनशीलता

निक्की शर्मा 'रश्मि'
अब देश में अपराध पर राजनीति होने लगी है। अपराध और अपराधी की जाति और धर्म नहीं होता है। इस विषय पर भी राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए । ओछी मानसिकता रखने वाले यह जान लें कि धर्म और जाति को मिलाकर अपराध का दायरा छोटा-बड़ा करने से कुछ नहीं होगा बस सोच बदलनी होगी। सामाजिक परिवेश में राजनीति की असंवेदनशीलता जकड़ रखा है । आज भारत देश की मां गंगा भी शर्मसार होगी उस में डुबकी लगाकर पाप धोने आने वालों को लेकर। पर्वत हिमालय भी शायद रो रहा होगा इतना विशाल हृदय होकर भी वह अपनी बेटियों की रक्षा नहीं कर पा रहा और नदियां रो रही होंगी जिसमें इस देश की बेटियों की अस्थियां प्रवाहित की जाती होंगी। बस रोती नहीं है तो राजनीति, रोते नहीं है तो बस समाज में मौजूद असंवेदनशील लोग। बलात्कार जैसी वीभत्स घटना पर सियासत करना शर्मसार करती है। यह याद रखें सियासत चमकाने वाले यह आग कभी न कभी तुम्हारे घर तक भी पहुंच सकती है। अपराध कब कहां हो जाए कहा नहीं जा सकता। अपराधियों पर नकेल नहीं कसा गया तो देश यूं ही शर्मसार होता रहेगा। दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि नारी देश में आज भी सुरक्षित नहीं, घर में सुरक्षित नहीं। दरिंदों की हैवानियत के कारण अब कितनी ही बेटी हमारे बीच नहीं है। न्याय दिलाने के साथ पीड़ित परिवार की मदद करनी होगी। अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए तुरंत.. ना कि इंसाफ की लड़ाई में एक बार फिर सालों गुजर जाए।संवेदनशील बनकर इस पर सोचना होगा। राजनीति से बाहर निकल कर जरा सोचो मानसिकता तभी बदलेगी जब सोच बदलेगी। नारी के प्रति गंदी नजर वालों को तुरंत सजा मिलनी चाहिए लेकिन इसके बजाय सालों इंसाफ के लिए पीड़ित परिवार लड़ता रहता है। अपराधियों को पता है इतना आसान नहीं हमारे देश में सजा मिल जाना। सजा तो लड़की और उसके परिवार वालों को मिलती है। सालों दर्द झेलते हैं इंसाफ की लड़ाई में कितने तो चुप रह जाते हैं।
समाज किस ओर जा रहा एक बार चिंतन करके देखें ।कानून नहीं हमें सोच बदलनी होगी,लड़कों को सिखाना होगा सम्मान करना नारी का। समाज के सभी लोगों और कानून-व्यवस्था से आगे अपेक्षा होगी कि लाचारी,बेबसी और तड़प से नारी बाहर निकल सके और एक समय ऐसा लाएंं.. जहां बच्चियां, औरतें बेखौफ होकर घूमे।आशा है एक सम्मान ,बेखौफ, आजादी और बेवाकपन से जीने का अधिकार जरूर मिलेगा। खुद को बदलें अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें भारतीय संस्कृति में नारी के महत्व और सम्मान को बताएं समझाएं । मां,बहन और बेटियों के पवित्र रिश्ते को बताएं। मानसिकता बदलेगी तभी सब कुछ बदलेगा। नजरिया बदलें.. सोच बदलेगी.. तभी गंदी मानसिकता से आजादी मिलेगी। महिलाओं को सम्मान देना बचपन से बतलायें तभी सोच अच्छी रहेगी, सम्मान नारी के प्रति रहेगा।नयी सोच नया बदलाव लाएं । नारी और भी सशक्तिकरण की तरफ कदम आगे बढ़ा पाएगी। नारी पूरी तरह सशक्त हो उठेगी बस जरूरत है समाज में थोड़े से बदलाव की एक और पहल की।
भारतीय संस्कृति में नारी को बहुत ही सम्मान और महत्व दिया गया है, धरती पर नारी के अनेक रूप हैं। नारी को दुर्गा , काली, चंडी एवं सरस्वती का रूप मानने वाले लोगों की मानसिकता कहां लुप्त हो गई है समझ नहीं आ रहा। हालांकि नारी की स्थिति में पहले की तुलना में काफी हद तक सुधार हुआ है, नारी शिक्षा को बढ़ावा मिलने से प्रगति पथ पर अग्रसर होती रही है। राजनीति हो या व्यवसाय हर जगह नारी की भागीदारी है, आज नारी के बिना इस संसार में कुछ भी नहीं है इसके बिना, यह सृष्टि अधूरी है। भारतीय समाज को हमेशा पुरुष प्रधान माना गया लेकिन अब 21वीं सदी में आया है और आज नारी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही हैं, फिर भी जो सम्मान, जो इज्जत नारियों को मिलनी चाहिए वह मिलती ही नहीं है। जिस तरह के अमानवीय व्यवहारों से वह गुजरती है उसका अंदाजा भी शायद लगाना मुश्किल है। एक तरफ हम उन्हें आगे बढ़ाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ अभद्रता की हद पार करते हैं,आजकल महिलाओं,छोटी-छोटी बच्चियों के साथ अभद्रता की सारी सीमाएं टूट गई है।आज एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब हम बलात्कार जैसी वीभत्स घटना के बारे में नहीं सुनते हैं। 4 महीने की बच्ची तक सुरक्षित नहीं है।आज इक्कीसवीं सदी में पहुंचकर भी समाज की सोच नहीं बदल रही। क्यों.. नारी के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा,अपनी सोच बदलिए। महिलाओं की सुरक्षा के लिए नियम तो बनते हैं, पर क्या उन्हें इस कानून से इंसाफ मिला,? नहीं..... । कमजोर कानून व्यवस्था में खत्म हो गया डर किसी को कानून का हो तभी तो..पर... डर कैसा... जब गलती की सजा नहीं मिलती तो गलतियां तो आगे भी करते ही जाएंगे। यह बात कोई क्यों नहीं समझ पाता, हैवानियत की हद पार कर जिस तरह आज देश के हर हिस्सों में महिलाओं के साथ ये सब हो रहा, अगर फांसी की सजा सुनाई जाती तो घटनाएं कम जरूर होती। नारी शक्ति की बातें करते हैं, नियम बनाते हैं पुरुष और फिर उसी नारी को कुचल डालते हैं, क्योंकि पुरुष प्रधान समाज है। कहने को आज नारी कदम से कदम मिलाकर चल रही है पुरुषों के साथ ताल से ताल मिला रही है पर नजरिया आज भी पुरुषों का नहीं बदला। अगर चार बातें हंसकर कर लो तो गलत समझ कर फायदा उठाने की कोशिश करते हैं,मौका पाने पर रौंंदने से बाज नहीं आते। आखिर क्यों..? क्योंकि हमारे देश का कानून कमजोर है। सोच बदलो तभी नजरिया बदलेगा और फिर देश और हर बेटी भी । सोच बदल कर तो देखो।मुम्बई महाराष्ट्र
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