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माॅं चंद्रघंटा

माॅं चंद्रघंटा

सिंहवाहिनी दशभुजी हैं माता ,
अर्द्धचंद्र विराजता माॅं भाल है ।
भक्तों के माॅं कल्याण हैं करती ,
दुष्टों हेतु होतीं माता काल हैं ।।
पुष्प खड्ग त्रिशुल हस्त शोभे ,
गदा वाण चक्र अस्त्र शस्त्र तेरे ,
दुष्टों की संहार करती समूल है ।
साधु संत गुणीजनों की रक्षा ,
माॅं का प्रथम उद्देश्य मूल है ।।
यूक्रेन रूस का है यह युद्धारंभ ,
और युद्ध हमास इजराइल में ।
चारो हुए हैं इस युद्ध में मग्न ,
स्व गोला बारूद मिसाइल में ।।
दे दो माॅं सबके मन को शांति ,
या तो युद्ध को शीघ्र विराम दे ।
या दुष्टों का शीघ्र कर दे संहार ,
विश्व को पुनः नया आयाम दे ।।
मर रहे हैं युद्ध में नाहक ही ये ,
निरपराध सज्जन औ लाचार ।
मर चुकी मानव की मानवता ,
हो रहीं नृशंस हत्याएं लगातार ।।
भूल चूक हो गई हो किसी से ,
मॉं तुम उसे अब तो क्षमा करो ।
कायम हो धरा पे पुनः देवत्व ,
माॅं तुम‌ अब भी धरा पे रमा करो।।
सादर नमन तुम्हें माता चंद्रघंटे ,
भक्तों पर माॅं अब भी दया करो ।
अंतर्मन में जो भरे पड़े हैं गंदगी ,
उसे मिटा पावन मन नया करो ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
डुमरी अड्डा
छपरा ( सारण )बिहार ।
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