लूट की हसरतें, जो दिल में लेकर घूमते हैं,
जालसाज़ों के क़िस्से, सब मेरी निगाहों में हैं।कत्ल करके हमदर्दी जताना, यह पुराना खेल है,
क़ातिलों के हमदर्द सारे, अब मेरी निगाहों में हैं।
अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली, तभी कूकर भौंकते,
किसके टुकड़ों पर पले हो, सब मेरी निगाहों में है।
पीपल वृक्ष पर देवता का, सच जो समझे नही,
मुहावरों के अनर्थ का सच, वह मेरी निगाहों में है।
अ कीर्ति वर्द्धन
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