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लिफाफा

लिफाफा

डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
चिट्ठीरसाँ
डाल गया है एक लिफाफा
गेट में लगी पत्रपेटी में ।
पत्रपेटी के दहन से
झाँक रहा लिफाफा
बेहद खुशनुमा, बेपायाँ खुशगुवार
पेटी से लिफाफे को निकाला
बेइंतहा एहतियात से
कि कहीं खरोंच न लग जाए।
लिफाफा, जिसकी सूरत
दिलकश हो इतनी
भीतर खत की सीरते मज्मून भी
क्या खूब होगी!
लिफाफे की खूबसूरती पर फिदा दिल ,
कुछ देर तक तो खड़े-खड़े
कलेजे से लगाए रहा ,
हाथ काँपने लगा लिफाफे को खोलने में
कहीं चीरा न लग जाए बेजा,
लिफाफे की खूबसूरती बिगड़ न जाए।
ऐसा खूबसूरत लिफाफा
जिंदगी में पहली बार दस्तयाब,
एक नायाब नमूना
ताआखिरी नफस सँजो कर रखने लायक ।
कुछ लोग होते हैं
जो भाँप लेते हैं मज्मून
लिफाफे को देखकर ही
मगर मुझे इतना शऊर कहाँ,
इतनी लियाकत कहाँ?
आखिर लिफाफे को खोलना तो था ही
किसी दिलअजीज का खत
पढ़ना तो था ही।
लिफाफे को खोला,
हाथ डाला,
हैफ, लिफाफा खाली था
केवल खोल,
जैसे तकिए का लिहाफ
जिसमें रुई न हो,हवा हो
फकत हवा।
लिफाफा पड़ा है सामने
नूरानी, रौनकदार
मगर बेखत, बेमज्मून
बेजान, बेजुबान,
जैसे मनोरम शरीर हो निष्प्राण
प्रियतमा का,
आँखें बेतहाशा अश्कबार हो आईं कलेजा थाम कर रह गया।
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