शिव नर्तन बहुत जरूरी है
डॉ. कुमारी रश्मि प्रियदर्शनी
शिव नर्तन बहुत जरूरी है
चाटुकारिता जब अधीश को, अभिवंदन-सा जान पड़े।
सर्प आत्म-सम्मोहन के रहते हों जिसे सदा जकड़े।।
सच्चे हितैषियों को करके दरकिनार, अपमान करे।
वैसे मूर्ख घनानंदों की ही सत्ता तृणवत बिखरे ।।
आत्म-प्रशंसा का मद बड़ा भयंकर, घातक होता है।
नर नारायण मान स्वयं को, बीज ध्वंस के बोता है।।
शुभेच्छुओं को शत्रु बताकर, करता जाता खुद से दूर।
लगा चारणों की दरबार, कराता अपनी स्तुति भरपूर।।
नहीं समझ में आतीं जब अधिपति को बातें क्षेममयी।
प्रजाजनों को दास समझ, चलता हो चालें नयी-नयी।।
करके तिरस्कार विद्वानों का अतीव सुख पाता हो।
अपने हाथों से अपने किरीट पर दाग लगाता हो।।
अहंकार में डूब अगर, राजा स्वच्छंद विचरता हो।
भोली-भाली जनता पर अन्याय अहर्निश करता हो।।
निराधार कानून बना, भय प्रजाजनों में भरता हो।
किंतु, उन्हीं नियमों को स्वयं तोड़ते तनिक न डरता हो।।
सत्य छिपा जो चहुँदिश मिथ्या का बाजार सजाता हो।
खुद को सर्वेसर्वा, सर्वप्रतापी कह इतराता हो।।
चाटुकारिता और प्रशंसा में न जिसे विभेद हो ज्ञात।
वैसे राजा की सत्ता ही खतरे में रहती दिन-रात।।
इक दिन निज कर्मों का फल, पा ही जाते हैं अभिमानी।
चंद्रगुप्त को मिल ही जाते हैं चाणक्य सदृश ज्ञानी।।
बढ़ती हुई निरंकुशता का मर्दन बहुत जरूरी है।
अनाचार का नाश, न्याय-संवर्द्धन बहुत जरूरी है।।
जहाँ दमन हो, वहाँ नया परिवर्तन बहुत जरूरी है।
क्षयित धरा पर नव उपवन, नव जीवन बहुत जरूरी है।।
सहनशीलता की भी होती है इक निर्धारित सीमा।
अगर पाप बढ़ते जायें, शिव-नर्तन बहुत जरूरी है।।
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सर्प आत्म-सम्मोहन के रहते हों जिसे सदा जकड़े।।
सच्चे हितैषियों को करके दरकिनार, अपमान करे।
वैसे मूर्ख घनानंदों की ही सत्ता तृणवत बिखरे ।।
आत्म-प्रशंसा का मद बड़ा भयंकर, घातक होता है।
नर नारायण मान स्वयं को, बीज ध्वंस के बोता है।।
शुभेच्छुओं को शत्रु बताकर, करता जाता खुद से दूर।
लगा चारणों की दरबार, कराता अपनी स्तुति भरपूर।।
नहीं समझ में आतीं जब अधिपति को बातें क्षेममयी।
प्रजाजनों को दास समझ, चलता हो चालें नयी-नयी।।
करके तिरस्कार विद्वानों का अतीव सुख पाता हो।
अपने हाथों से अपने किरीट पर दाग लगाता हो।।
अहंकार में डूब अगर, राजा स्वच्छंद विचरता हो।
भोली-भाली जनता पर अन्याय अहर्निश करता हो।।
निराधार कानून बना, भय प्रजाजनों में भरता हो।
किंतु, उन्हीं नियमों को स्वयं तोड़ते तनिक न डरता हो।।
सत्य छिपा जो चहुँदिश मिथ्या का बाजार सजाता हो।
खुद को सर्वेसर्वा, सर्वप्रतापी कह इतराता हो।।
चाटुकारिता और प्रशंसा में न जिसे विभेद हो ज्ञात।
वैसे राजा की सत्ता ही खतरे में रहती दिन-रात।।
इक दिन निज कर्मों का फल, पा ही जाते हैं अभिमानी।
चंद्रगुप्त को मिल ही जाते हैं चाणक्य सदृश ज्ञानी।।
बढ़ती हुई निरंकुशता का मर्दन बहुत जरूरी है।
अनाचार का नाश, न्याय-संवर्द्धन बहुत जरूरी है।।
जहाँ दमन हो, वहाँ नया परिवर्तन बहुत जरूरी है।
क्षयित धरा पर नव उपवन, नव जीवन बहुत जरूरी है।।
सहनशीलता की भी होती है इक निर्धारित सीमा।
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