ख़्वाबों,ख़्वाहिशों के कैदी न होते,
तो यह दिल लापता न होता।रहगुज़र में तन्हा सफर करते,
गोया यह खूबसूरत हादसा न होता।
मंज़िल न होती हमनफस न होता,
इस ज़िंदगी का कोई फायदा न होता।
यूँ ही चल पड़ते राह-ए-ज़ुल्मत में,
मुकाम-ए-इश्क़ ग़र अलहदा न होता।
जिंदगानी थम जाती मझधार में,
ग़र यारों से हमारा राब्ता न होता।
है मुहब्बत भी बड़े काम की चीज़,
फ़क़त इसमें मशग्ला न होता।
ख़्वाबों और ख़्वाहिशों के इत्र ग़र न होते,
तो बा-यक़ी मंज़िल का रास्ता न होता।
ख़्वाबों के धागे से बुनी जाती है हक़ीक़त,
बिन इसके खुशियों का फ़लसफ़ा न होता।
डॉ रीमा सिन्हा
लखनऊ-उत्तर प्रदेश स्वरचित
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag
0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com