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स्त्री मन सदा कुंवारा

स्त्री मन सदा कुंवारा

मृदुल पावन सरस भाव,
अंतर प्रवाह विमल सरिता ।
त्याग समर्पण प्रतिमूर्ति,
अनंता अत्युत्तम कविता ।
सृजन उत्थान पथ पर,
शुभ मंगल अविरल धारा ।
स्त्री मन सदा कुंवारा ।।


स्नेहगार दया उद्गम स्थल,
सृष्टि अप्रतिम श्रृंगार ।
पूजनीय कमनीय शील युत,
दृष्टि बिंदु नैतिक धार ।
उमा रमा शारदा सरिस,
उत्संग स्नेह प्रेम पसारा ।
स्त्री मन सदा कुंवारा ।।


अद्भुत तेज पुंज उज्ज्वल,
जग ज्योति अखंडित ।
हर युग अति गुणगान,
गरिमा महिमा शीर्ष मंडित ।
ऊर्जस्वित कर प्राण सकल ,
शक्ति भक्ति बुलंद जयकारा ।
स्त्री मन सदा कुंवारा ।।


संस्कृति संस्कार धर्म रक्षक,
परंपरा मर्यादा युक्त चरित्र ।
नैतिक सात्विक पथ गामिनी ,
व्यक्तित्व कृतित्व पवित्र ।
अथक श्रम उत्सर्ग साधना,
परम माध्य जगत उजियारा ।
स्त्री मन सदा कुंवारा ।।


कुमार महेंद्र


(स्वरचित मौलिक रचना)
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