बात रात की बाकी रह गई।
डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
बात रात की बाकी रह गई।
सब्र के लिए सबा कह गई।
वो तो चले गए यों कब के ,
छाप कदमों की बस रह गई।
याद की गलियों में, हमदम ;
जबिस्ताँ बे-शाल निबह गई।
नदी गायब हुई सहरे में,
फक़त रेत ही रेत रह गई।
छूट गई जो ट्रेन ग़फलत में,
अब इंतजार की वजह गई।
कश्ती जो निगल गया दर्या,
उम्मीद बाजुओं पे रह गई।
वो तो चले गए यों कब के ,
छाप कदमों की बस रह गई।
याद की गलियों में, हमदम ;
जबिस्ताँ बे-शाल निबह गई।
नदी गायब हुई सहरे में,
फक़त रेत ही रेत रह गई।
छूट गई जो ट्रेन ग़फलत में,
अब इंतजार की वजह गई।
कश्ती जो निगल गया दर्या,
उम्मीद बाजुओं पे रह गई।
(जबिस्ताँ =जाड़े का मौसम)
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