विलखता श्मशान :: विहंसता इन्सान
कमलेश पुण्यार्क "गुरूजी"कड़ाके की ठंढ में ऐन गोधूली बेला में स्वनामधन्य भोंचूशास्त्रीजी अपने कंधे पर छोटी सी गठरी लिए, विष्णुनगरी, गयाधाम के श्मशान परिसर की ओर जाते हुए नजर आए । उत्सुकतावश मैं भी उनके पीछे-पीछे लपकता चल दिया। पता नहीं किसकी अन्तिमयात्रा में शामिल होने जा रहे हैं वे।
चुँकि पीछे से किसी वरीय बन्धु को आवाज लगाना सभ्यता के विपरीत है, भले ही आजकल ये सब औपचारिताएँ गधे की सींग की तरह गायब हो गई हैं।
यात्रा श्मशान की ओर हो रही है, इसलिए चरणवन्दन तो उचित नहीं। अतः हाथों के संकेत से ही सवाल करना मुनासिब लगा। समीप पहुँचकर पूछा—क्या बात है शास्त्री जी ! किसे विदा करने जा रहे हैं इस भयंकर शीतलहरी में?
मुँह विचकाते हुए शास्त्री ने कहा — “ ढोंगी बाबाओं की तरह राख लपेटकर, श्मशान साधना तो करनी नहीं है और न योग्य गुरु ही मिलने वाले हैं असली साधना सिखाने वाले। दरअसल लकड़ी बहुत महंगी हो गई है। कान कंपकपाने वाली शीतलहरी में आग तापने जा रहा हूँ बचवा ! मुझे भला किसे विदा करने की पड़ी है...कौन है मेरा यहाँ अपना...मानो तो सब अपने ही हैं, न मानों तो इस दुनिया में किसी का कोई नहीं है...सब मृगतृष्णा में भटक रहे हैं। जो था नहीं अपना कभी, जो है नहीं अपना कहीं, जो हो नहीं सकता अपना कभी, उसे ही अपना माने बैठी है दुनिया...खुद भी परेशान, दूसरे को भी परेशानी... ।
“... अरे ये दुनिया तो वैसी ही है न—अन्यानि वहति काष्ठानि नद्यानि वहति संगमे । संगमे वायु वृक्षस्य काकस्य परिवेदना— नदी में छोटी-छोटी लकड़ियाँ बहते रहती हैं । वायु के झोंके से प्रभावित होकर कभी-कभी दो लकड़ियाँ एक साथ हो जाती हैं । पुनः उसी वायु के प्रभाव से विलग भी हो जाती हैं । अब भला एक लकड़ी दूसरी लकड़ी को अपना मान ले—इससे बड़ी मूर्खता और क्या होगी...!
“...या ऐसा भी कह सकते हो— एकः वृक्षः समारुढ़ नाना पक्षि समागमः । प्रातः परिविहंग्याति काकस्य परिवेदना । — रात के समय तरह-तरह के पक्षी विभिन्न स्थानों से आकर एक ही वृक्ष पर निवास करते हैं और सुबह पुनः कहीं न कहीं उड़कर चले जाते हैं। ये संसार रूपी वृक्ष भी ऐसा ही तो है। कुछ खास समय के लिए हमसब इकट्ठे हो जाते हैं अपने-अपने कर्मानुसार, अपना-अपना किरदार निभाने । ”
शास्त्रीजी के तात्विक दार्शनिक शब्दजाल में मैं उलझ कर रह गया। किन्तु कुछ कहने के वजाय सिर हिलाते रहा—जैसे कक्षा में पिछली बेंच पर बैठा बच्चा सिर हिलाकर शिक्षक की बातों को समझने का स्वांग रचता है।
शास्त्रीजी का कथन जारी था— “... मेरा तो जब कभी जी घबराता है, तो इधर ही आ जाता हूँ। बड़ी शान्ति मिलती है यहाँ। इतना पावन, इतना शान्त, इतना मनोरम स्थान कहीं और शायद ही मिले धरती पर। ”
उनकी इस बात पर मैं कुछ कहना चाहा, किन्तु उससे पहले ही शास्त्रीजी मेरा हाथ पकड़कर बोले — “ बड़े अच्छे मौके से आए हो। चलो आओ मेरे साथ। उधर धधकती चिता से तनिक दूर हटकर बैठें इत्मिनान से। ठंढ भी नहीं लगेगी और बातें भी होंगी। बहुत दिनों बाद आज मिलना हुआ है तुमसे। ”
शास्त्रीजी से बातें करने में नहीं, उनकी बातें सुनने में अधिक तृप्ति मिलती है। वैसे भी आदतन वे बहुत कम बोलते हैं, बहुत कम लोगों से बातें करते हैं। किन्तु बातें करने लग जाते हैं, तो फिर गंगोत्री से झरती वेगवती पतितपावनी की धार की तरह बहते ही जाते हैं, बहते ही जाते हैं। उनके विचारों में बड़ा उद्वेलन है। हृदय में बड़ी टीस है। वेदना है। और विचित्र सन्तोष भी।
श्मशान परिसर में प्रवेश करने पर देखा कि आज बहुत भीड़ है। पता चला कि दो दिन पहले ही धार्मिक मुखौटा वाला राजनैतिक ताण्डव मचा है पास के किसी गांव में। विभागीय औपचारिकताओं की खानापुरी के बाद आज बीसियों शव आए हैं यहाँ।
सुनते हैं कि दैत्यराज गयासुर ने विष्णु से वचन लिया था— एक पिण्ड और एक मुण्ड उसे नित्य चाहिए ही चाहिए, अन्यथा विष्णुनगरी को पलटकर रख देगा। वरदान मांगते समय उसे शायद पता नहीं होगा कि आनेवाले समय में इन्सानी लहू और मुण्ड बहुत सस्ता हो जायेगा। धर्म और राजनीति का चौसर जबतक विछा रहेगा, तबतक ऐसी नौबत ही नहीं आयेगी कि एक भी शव न मिले इस प्रेतभूमि को। दुनिया में आते समय से लेकर जाते समय तक भीड़ का हिस्सा बने ही रहना है—अस्पताल से लेकर श्मशान तक भीड़ ही भीड़ है। इस भीड़ से भागकर बचना बड़ा कठिन है। जो भाग लिया वो जीवनमुक्त हो गया।
भीड़ से जरा हट कर, फल्गु किनारे चहुँ ओर बिखरी बदबूदार गंदगी के बीच जरा एकान्त ठौर तलाशकर शास्त्रीजी ने अपना अंगोछा बिछाया और पद्मासन लगाकर बैठ गए। बगल में मैं भी बैठ गया।
सामने की ओर इशारा करते हुए शास्त्रीजी बोले — “ वो रहा पहाड़ी तलहटी में सिर उठाए सीताकुण्ड। वालुकापिण्डदान का साक्ष्य समर्थन न मिलने से कुपित सीता ने ही फल्गु को शापित किया था। देखो आज इस पुण्यसलिला फल्गु की क्या दुर्दशा है ! नदी तो नदी, श्मशान तक को भी ढकार गए मूरख। नदी के दोनों छोर से कूड़ों का अम्बार विछाया जा रहा है बड़े सुनियोजित ढंग से। कूड़ों को पाट कर, पहले वहाँ लोकतन्त्र के चहेते-दुलरुओं द्वारा अतिक्रमण होता है। फिर भूमाफिआओं का चौपड़ सजता है। रामशिला हो कि ब्रह्मयोनि, गृध्रकूट हो कि भद्रकूट, ब्रह्मसरोवर, वैतरणी और प्रेतशिला तक को भी नहीं बक्शा इन हरामखोरों ने। अभी दो साल पहले तक फल्गु के प्रशस्त रेत पर एक साथ सैकड़ों चिताएँ जलाने की सुविधा थी। पूरे क्षेत्र में जिसे जहाँ जी चाहे चिता सजा दे धर्म और लोक मर्यादा का ध्यान रखते हुए...।
“...मगर अब देखो, कैसा वीभत्स दृश्य है यहाँ का—तट पर बूढ़े ब्रह्मा की पुरानी सृष्टि वाले गंधाते-बजबजाते कीड़े और ऊपर मॉडर्न शवदाहगृह । वाह ! कैसा सामंजस्य है ! आधुनिक सुविधा के नाम पर शवदाह हेतु छोटा सा शेड बना दिया गया है और बाकी हिस्से को विकासवाद का भेंट चढ़ाकर मधुबनी चित्रकला से सुसज्जित कर दिया गया है। इतना ही नहीं सीताशापित फल्गु पर कृपा करके, उसके उद्धार के लिए विश्व का अद्वितीय रबरडैम बना दिया गया और पाइपलाइन से लाकर गंगाजल भी भरा गया। विकास के नाम पर कई करोड़ का बिल बना । ऐसे में नगरविकास हो न हो, ठेकेदार से मन्त्री तक का तिजोरी-विकास तो हो ही गया न । अब चाहें तो शवयात्रा में आए लोग अपनी उदासी और थकान मिटा सकते हैं यहाँ बोटिंग करके भी । सुनते हैं कि बहुत जल्दी ही उम्दा किस्म का रिसोर्ट भी खुलने जा रहा है... । ”
जरा ठहर कर शास्त्रीजी ने कहा— “… मेकाले के औलादों की बुद्धि में ये बात भला क्योंकर समा सकती है कि शवदाह ही नहीं, समस्त प्रेतकर्म खुले आसमान के नीचे ही होना चाहिए। पवित्र पीपल की छाँव के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए—किसी तरह का व्यवधान नहीं। विशेष परिस्थिति में पितृकर्म कक्ष-बन्धित हो भी सकता है, किन्तु प्रेतकर्म तो खुले अन्तरिक्षीय सम्पर्क में ही होना चाहिए। धर्मशास्त्र निर्दिष्ट है कि शवदाह की भूमि कैसी होनी चाहिए, क्षेत्र कैसा होना चाहिए। नगर-ग्राम के वायव्यकोण में श्मशान-भूमि हो। गंगा-यमुनादि विशिष्ट नदियों का संयोग जहाँ उपलब्ध न हो, तो किसी अन्य नदीतट का चयन करना चाहिए। यदि वो भी सम्भव न हो तो ग्राम-सीमा से किंचित् दूर हटकर, निर्जन स्थान का चुनाव करना चाहिए। श्मशान-वास्तु का नियम कहता है कि श्मशान-भूमि की ढलान यम की दिशा यानी दक्षिण की ओर होनी चाहिए, जहाँ समीप में पीपल का वृक्ष अवश्य हो..।
“… किन्तु सनातन संस्कृति को हृदयंगम किए बिना, सनातन धर्म की बारीकियों को समझे बिना, सनातन की धज्जियाँ उड़ाने की कसम खाए बैठे ज़ाहिलों द्वारा ऐसे-ऐसे हास्यास्पद निर्णय लिए जा रहे हैं। बेहूदे तर्क देकर कि जंगल नष्ट हो रहे हैं...लकड़ियाँ महंगी हो गई हैं...पारम्परिक विधि से शवदाह करने से प्रदूषण फैल रहा है...विद्युत शवदाहगृह की अनिवार्यता सिद्ध की जा रही है...। “… ज़ाहिलों की जमात को भी ऐसा ही लगने लगा है कि पारम्परिक रीति से शवदाह करने में समय, संसाधन और श्रम की बरबादी होती है। समय—काल अपने आप में सर्वाधिक वलिष्ट है। काल ही नियन्ता है। काल ही नियामक है। काल ही विधायक है। काल ही भोक्ता भी है और काल ही कर्ता भी। हमसब काल के वशीभूत कर्तापन का भ्रम पाले बैठे जीव मात्र हैं। सब काल का ही खेल है। तुम जिसे आधुनिक विकास माने बैठे हो, वो तुम्हारे सर्वनाश का आवाहन है। पतन की ओर यात्रा है। वैसे भी विकास 0 डिग्री से 360 डिग्री तक ही हो सकता है। उसके बाद तो चक्र की ढलान ही है न। ये न भूलो कि इस विलखते श्मशान के अन्तस में भी विहंसते काल का ही अट्टहास गुँजायमान है। काल के इस रहस्य को यदि जान-समझ लिए तो समझो बेड़ा पार हो गया, अन्यथा बेड़ा गर्क है। कालचक्र में भटकते रहोगे जन्म-जन्मान्तरों तक। अतः नवोदित सांयन्सवादी आधुनिकता और विकास के गुलदस्तेनुमा कूड़ेदान को परे हटाकर, परम सत्य— सनातन को समझने का प्रयास करो। इसे स्वीकार करो। इसे अंगीकार करो। इसी में भलाई है तुम्हारी । और हाँ—विज्ञान का अंग्रेजी अनुवाद सांयन्स कदापि नहीं होता। ये तो मूर्खों की डिक्शनरी की उपज है सिर्फ। ”
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