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शिव रात्रि

शिव रात्रि

अरुण कुमार उपाध्याय
१. गायत्री-गायत्री मन्त्र ब्रह्म के ३ रूपों का वर्णन करता है। प्रथम पाद स्रष्टा रूप ब्रह्मा है- तत् सवितुर्वरेण्यम्। सव = प्रसव, उत्पन्न करना। सविता = उत्पन्न करने वाला। पृथ्वी को सूर्य ने उत्पन्न किया है, सूर्य यह (निकट का) सविता है। सूर्य का सविता ब्रह्माण्ड है (पितामह)। ब्रह्माण्ड का सविता स्वयम्भू मण्डल या पूर्ण विश्व है। उसे उत्पन्न करने वाला अव्यक्त ब्रह्म तत् (दूर का) सविता है। वह वरेण्य है, पर बुद्धि या अनुभव से परे है। धी द्वारा अनुभव योग्य सूर्य है, जो तेज (भर्गः) के कारण दीखता है-भर्गो देवस्य धीमहि। जीवन-दाता रूप में सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है। तेज के विभिन्न स्तरों का अनुभव रुद्र या शान्त रूप शिव है। उसका मनुष्य शरीर के भीतर प्रेरणा या ज्ञान शिव है जो गायत्री का तृतीय पाद है-धियो यो नः प्रचोदयात्। अन्य प्रकार से प्रथम पाद आकाश के विश्व का वर्णन करता है जो आधिदैविक विश्व है। जिसका पृथ्वी पर हमको अनुभव होता है, वह आधिभौतिक विश्व है, जो द्वितीय पाद है। विश्व की प्रतिमा मनुष्य आध्यात्मिक विश्व है जो गायत्री का तृतीय पाद है। वेद मन्त्रों के यह ३ मुख्य अर्थ हैं (गीता, ८/१-४)। तैत्तिरीय उपनिषद्, शीक्षा (शिक्षा का आर्ष रूप) वल्ली में मन्त्रों के ५ अर्थ कहे हैं। इनको मिला कर भास्कर राय भारती ने गायत्री वरिवस्या में मन्त्रों के ३ x ५ = १५ अर्थ कहे हैं।
२. सूर्य के विष्णु तथा शिव रूप-भूमि पूजा में मन्त्र पढ़ा जाता है कि पृथ्वी का विष्णु ने धारण किया है।
पृथिवी त्वया धृता लोकाः, देवि! त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥
यह कई वेद मन्त्रों का सारांश है-
मही द्यौः पृथिवी च इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः॥१३॥
अतो देवा अवन्तु नो, यतो विष्णुर्विचक्रमे। पृथिव्याः सप्त धामभिः॥१६॥
(ऋक्, १/२२/१३, १६)
विष्णोर्नु (नु = निश्चयार्थक, जैसे भोजपुरी में) कं वीर्याणि प्र वोचं, यः पार्थिवानि विममे रजांसि (रजांसि = पृथ्वी से आरम्भ कर ७ लोक)। (ऋक्, १/१५४/१)
त्रिर्देवः पृथिवीमेष एतां वि चक्रमे शतर्चसं महित्वा।
प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान्त्वेश्गं ह्यस्य स्थविरस्य नाम॥३॥
वि चक्रमे पृथिवीमेष एतां क्षेत्राय विष्णुर्मनुषे दशस्यन् ॥४॥ (ऋक्, ७/१००/३, ४)
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा पृथिवी संशितोऽग्नि तेजाः।
पृथिवीमनु वि क्रमेऽहं पृथिव्यास्तं निर्भजामो योऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः।
स मा जीवीत्तं प्राणो जहातु॥ (अथर्व, १०/५/२५)
सूर्य के कई प्रकार के क्रमों का वर्णन अथर्व सूक्त (१०/५) में है-क्रमु पाद विक्षेपे (धातुपाठ १/३१९)-१. आक्रमते, क्रम्यते-निर्भयता से जाना, रक्षण करना, बढ़ना। २. आक्रम-उगना, उदित होना। ३. उपक्रम-आरम्भ करना। ४. विक्रम-पद गिनते जाना। ५. व्याक्रम-अतिक्रमण करना, आज्ञा भङ्ग करना। ६. अतिक्रम-बाहर जाना। ७. आक्रम-जय पाना, अधिक होना। ८. उत्क्रम-अतिक्रमण करना, आज्ञा भंग करना। ९. उपक्रम-निकल जाना। १०. निष्क्रम-आगे जाना। ११. पराक्रम-वीरता दिखाना, अन्य को पार करना। १२. प्रक्रम-निकल जाना, समीप आना। १३. परिक्रम-घूमना, चक्कर लगाना। १४. विक्रम-जीतना, ऊपर जाना। १५. संक्रम-स्थानान्तर करना, अन्य जगह जाना।
सूर्य केन्द्रित चक्रों के रूप में ३ चक्र सौर मण्डल के भीतर हैं, जो विष्णु के ३ पद हैं। प्रथम पद पृथ्वी कक्षा तक है, जो अग्नि या ताप क्षेत्र है। द्वितीय पद यूरेनस कक्षा तक वायु क्षेत्र है। यह सूर्य से ३,००० सूर्य व्यास तक है (मेरा २००० ई. का मेलकोट शोध संस्थान में प्रकाशित लेख)। इसका पता नासा के कासिनी यान द्वारा २००७ में चला। उसके बाद पृथ्वी व्यास के २ घात ३० गुणा तक सौर मण्डल है, जहां तक सूर्य का प्रकाश ब्रह्माण्ड से अधिक है।
(१) ताप क्षेत्र-सौर मण्डल में सूर्य व्यास को योजन कहा है।
शत योजने ह वा एष (आदित्य) इतस्तपति (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
स एष (आदित्यः) एक शतविधस्तस्य रश्मयः। शतविधा एष एवैक शततमो य एष तपति (शतपथ ब्राह्मण, १०/२/४/३)
यहां का घोर ताप क्षेत्र रुद्र है-घोरो वै रुद्रः। (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/७)
तद्यदेतं शतशीर्षाणं रुद्रमेतेनाशमयंस्तस्माच्छतशीर्षरुद्र शमनीयं शत शीर्षरुद्र शमनीयं ह वै तच्छतरुद्रियमित्याचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण, ९/१/१/७)
(२) वायु क्षेत्र-वायु क्षेत्र को इषा कहा गया है-इ॒षे त्वा ऊर्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ (यजुर्वेद का आरम्भ)।
सौर मण्डल में ईषा दण्ड का क्षेत्र या परिधि १८,००० योजन (योजन = सूर्य व्यास) कहा गया है-
योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।
ईषादण्डस्तहैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम॥ (विष्णु पुराण, २/८/२)
इसकी त्रिज्या प्रायः ३००० सूर्य व्यास होगी जो यूरेनस कक्षा तक है।
(३) तेज क्षेत्र-३० धाम तक सूर्य की वाक् है जहां तक वह वि-राजते = अधिक प्रकाशित है-
त्रिं॒शद्धाम॒ वि रा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते । प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑ ॥
(ऋक्, १०/१८९/३, साम, ६३२, १३७८, अथर्व, ६/३१/३, २०/४८/६, वा. यजु, ३/८, तैत्तिरीय सं, १/५/३/१)
पृथ्वी से आरम्भ कर हर धाम क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं। अतः सौर मण्डल का व्यास पृथ्वी व्यास का २ घात ३० गुणा है। ...द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
(४) तीनों क्षेत्र-अग्नि वायु रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थं ऋज्-यजुः साम लक्षणम्॥ (मनु स्मृति, १/२३)
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक्, १/२२/१७)
(५) विष्णु रूपी सूर्य का परम पद सूर्यों का समूह (ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी) सूरयः है। सूरयः का अर्थ विद्वान् भी है क्योंकि ब्रह्माण्ड में जितने नक्षत्र हैं, उतने मनुष्य शरीर में लोमगर्त्त (कलिल, cell) हैं (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/४/२, १२/३/२/५)।
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०)
ख व्योम ख-त्रय क-सागर षट्क नाग व्योमाष्ट शून्य यम-रूप नगाष्ट चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड सम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः॥ (सूर्य सिद्धान्त, १२/९०)
शिव क्षेत्र-सूर्य से तेज निकलना उसका रुदन है; सौर मण्डल का क्षेत्र रोदसी मण्डल है। ब्रह्माण्ड के खर्व संख्यक नक्षत्रों के सम्मिलित रुदन को क्रन्दन कहते हैं; और वह क्षेत्र क्रन्दसी मण्डल है। उसके बाहर विश्व के अनन्त विस्तार में रुदन या क्रन्दन से कोई अन्तर नहीं होता, वह संयती मण्डल या क्षेत्र है।
यदरोदीत् (प्रजापतिः) तदनयोः (द्यावा-पृथिव्योः) रोदस्त्वम् । (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/९/४)
(वाजसनेयी यजुर्वेद, ११/४३,१२/१०७)
इमे वै द्यावापृथिवी रोदसी । (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/४/२, ६/७/३/२, ७/३/१/३०)
इमे ( द्यावापृथिव्यौ) ह वाव रोदसी । (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, १/३२/४)
द्यावापृथिवी वै रोदसी । (ऐतरेय ब्राह्मण, २/४१)
यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने (ऋग्वेद, १०/१२१/६, वाजसनेयी यजुर्वेद, ३२/७, तैत्तिरीय संहिता, ४/१/८/५)
यं क्रन्दसी संयती विह्वयेते (ऋग्वेद, २/१२/८)
सूर्य से पृथ्वी कक्षा तक घोर ताप है, वह रुद्र भाग है। उसके बाद शिव क्षेत्र में शान्त तेज का आरम्भ होता है जहां जीवन सम्भव है।
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरा ऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्तामि चाकशीहि॥
(वाजसनेयी सं. १६/२, श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/५)
स्रोत को शीर्ष कहते हैं (द्रव गतिकी में हेड, या गीता १५/१-ऊर्ध्वमूलं अधः शाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम्)। पृथ्वी चन्द्र कक्षा के केन्द्र में है, अतः शिव के ललाट पर चन्द्र है।
शत योजने ह वा एष (आदित्य) इतस्तपति (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
स एष (आदित्यः) एक शतविधस्तस्य रश्मयः । शतविधा एष एवैक शततमो य एष तपति (शतपथ ब्राह्मण, १०/२/४/३)
सूर्य से १००० व्यास दूरी तक अधिक शान्त शिवतर क्षेत्र है।
नमः शिवाय च शिवतराय च (वाजसनेयी सं. १६/४१, तैत्तिरीय सं. ४/५/८/१, मैत्रायणी सं. २/९/७)
उसके बाद सौर मण्डल की सीमा तक शिवतम क्षेत्र है।
यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। (अघमर्षण मन्त्र, वाजसनेयी सं. ११/५१)
सौर मण्डल के बाहर सदा शान्त रूप सदाशिव है। वह ब्रह्माण्ड के अप् की तरङ्ग (अम्भ) से मिल कर साम्ब-सदाशिव हो जाता है।
सदाशिवाय विद्महे, सहस्राक्षाय धीमहि तन्नो साम्बः प्रचोदयात्। (वनदुर्गा उपनिषद्, १४१)
३. काल के शिव रुद्र रूप-विश्व की क्रियाओं का समन्वय नृत्य है। जब क्रियाओं का परस्पर मेल होता है तो वह लास्य है, अतः इससे रास रूप सृष्टि होती है। जब क्रियाओं में ताल-मेल नहीं होता तो वह शिव (रुद्र) का ताण्डव होता है जिससे प्रलय होता है। वर्ष में संवत्सर को अग्नि रूप कहते हैं, इसका आरम्भ सम्वत् जलाने से होता है। धीरे धीरे अग्नि खर्च होती रहती है। जब बिल्कुल खाली हो जाती है, तो फाल्गुन मास होता है। फल्गु = खाली (फल्ग्व्या च कलया कृताः= असत् से सत् की सृष्टि हुयी-गजेन्द्र मोक्ष)। यह खाली बाल्टी जैसा है अतः इसे दोल पूर्णिमा भी कहते हैं। सम्वत्सर रूप सृष्टि का अन्त शिव का श्मशान है, जिसके बाद पुनः सम्वत् जला कर नया वर्ष आरम्भ होता है। अतः फाल्गुन मास शिव मास है। मास में शुक्ल पक्ष में चन्द्र का प्रकाश बढ़ता है अतः यह रुद्र रूप है। कृष्ण पक्ष शिव है। कृष्ण पक्ष में भी रात्रि को जब चतुर्दशी तिथि होगी तब शिवरात्रि होगी, क्यों कि १४ भुवन हैं, जो तेज शान्त होने से उत्पन्न हुये हैं। शान्त या शिव अवस्था में ही सृष्टि होती है। जिस विचार से सृष्टि सम्भव है वह सङ्कल्प है-तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु (यजुर्वेद ३४/१-५)। अतः फाल्गुन कृष्ण पक्ष १४ (रात्रि कालीन) तिथि को महा शिवरात्रि होती है।
काल रूप दिवस मास वर्ष
रुद्र दिन शुक्ल पक्ष चैत्र
शिव रात्रि कृष्ण पक्ष फाल्गुन
४. शिव पार्वती विवाह-परब्रह्म के शिव-शक्ति या पुरुष-स्त्री रूपों के संयोग से सृष्टि हुयी। सृष्टि के आरम्ब को शिव-पार्वती विवाह कह सकते हैं। संवत्सर रूप सृष्टि का आरम्भ महाशिवरात्रि के बाद होता है। इस अर्थ में उसे शिव पार्वती विवाह कह सकते हैं। हर मास शिवरात्रि के बाद भी शुक्ल पक्ष का आरम्भ सृष्टि का एक छोटा चक्र है, वह भी तत्त्व रूप में शिव पार्वती विवाह है।
मनुष्य जैसे विवाह का अर्थ शिव के मनुष्य अवतार के लिए ही है। स्वायम्भुव मनु से लेकर कृष्ण द्वैपायन व्यास तक के २८ व्यासों को ज्ञान रूप में शिव का अवतार कहा गया है। लिंग पुराण (७/३०-३५) में आदियुग में शिव के २८ अवतारों की सूची है। उसके बाद (लिंग पुराण, ३७-५०) में प्रत्येक के ४-४ शिष्य अर्थात् ११२ शिष्यों के नाम हैं। लिंग पुराण अध्याय २४ में सभी २८ व्यासों और प्रत्येक के ४-४ शिष्यों की सूची है। शिव पुराण, शतरुद्र संहिता के अध्याय ४, ५ में २८ व्यासों और प्रत्येक के ४-४ शिष्यों का वर्णन है। २८ व्यासों की सूची कई पुराणों में है किन्तु उनके शिष्यों का उल्लेख नहीं है-कूर्म पुराण, अध्याय ५२, देवीभागवत पुराण, अध्याय १/२-३, ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/३५, वायु पुराण, ९८/७१-९८ विष्णु पुराण, ३/३, शिव पुराण, वायवीय संहिता, उत्तर खण्ड, अध्याय ८। अश्वत्थामा तथा पिप्पलाद को भी शिव अवतार कहा गया है (शिव पुराण, ३/३६, ३/२४)। इनके विवाहों का वर्णन नहीं है।
शिव विवाह का वर्णन २ प्रसंगों में है-दक्ष पुत्री सती के साथ (ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, ४/४२/८१, वायु पुराण, ३०/३८, भागवत पुराण, ४/३, शिव पुराण, २/२/१८ आदि)
पार्वती से शिव विवाह का वर्णन इन स्थानों में है-पद्म पुराण (१/४३-४५), ब्रह्म पुराण (१/३४), मत्स्य पुराण (१५४,१५८), लिङ्ग पुराण (१/१०२-१०३), शिव पुराण (२/३/१-२), स्कन्द पुराण (१/१/२२)। अग्नि पुराण (१७८/२) के अनुसार चैत्र शुक्ल तृतीया को गौरी एवं शिव का विवाह हुआ था। यह शिवरात्रि थिथि नहीं थी।
तृतीयायां चैत्र शुक्ले ऊढा गौरी हरेण हि। तिलस्नातो ऽर्चयेच्छम्भुं गौर्या हेमफलादिभिः॥ (अग्नि पुराण, १७८/२)
शिव पुराण, रुद्र संहिता, द्वितीय सती खण्ड (१८/२०) के अनुसार चैत्र शुक्ल त्रयोदशी रविवार पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में शिव ने विवाह के लिए प्रस्थान किया था और उसी दिन विवाह हुआ।
अथ चैत्रसिते पक्षे नक्षत्रे भगदैवते।
त्रयोदश्यां दिने भानौ निर्गच्छत्स महेश्वरः॥२०॥
पार्वती की विवाह तिथि के विषय में कुछ नहीं लिखा है। उल्लेख है कि गर्ग द्वारा लिखित लग्न पत्रिका को हिमालय ने जिस दिन शिव के पास भेजा था उसके ७वें दिन विवाह हुआ। विवाह के चतुर्थ दिन विदायी हुयी। (शिव पुराण, रुद्र संहिता, तृतीय पार्वती खण्ड, अध्याय ३९)-
अथ शम्भुर्गृहीत्वा तां मुदा मङ्गलपत्रिकाम्॥५॥
करिष्येऽहं विवाहं च तस्या वश्यो हि भक्तितः।
सप्तर्षिभिः साधितं च तल्लग्नं शोधितं च तैः॥१५॥
अद्यतः सप्तमे चाह्नि तद्भविष्यति नारद।
महोत्सवं करिष्यामि लौकिकीं गतिमाश्रितः॥१६॥
पश्चिम ओड़िशा के सम्बलपुर में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को शिव पार्वती विवाह होता है, जिसे शीतल षष्ठी कहते हैं। कार्त्तिकेय के समय अभिजित् का पतन हुआ था तथा माघ मास से संवत्सर का आरम्भ हुआ था। यह प्रायः १५,८०० ईपू में था। उस समय ज्येष्ठ मास से शीत ऋतु का आरम्भ होता था, अतः इसे शीतल षष्ठी कहते थे। वर्तमान काल में यह प्रबल ग्रीष्म समय है, किन्तु वही पारम्परिक नाम चल रहा है।
अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा। इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता॥८॥
तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्युतम्। कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय॥९॥
धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः। रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत्॥१०॥
(महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
माघशुक्ल प्रपन्नस्य पौषकृष्ण समापिनः। युगस्य पञ्चवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते॥५॥
स्वराक्रमेते सोमार्कौ यदा साकं सवासवौ। स्यात्तदादि युगं माघः तपः शुक्लोऽयनं ह्युदक्॥६॥
प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक्। सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघश्रवणयोः सदा॥७॥
(ऋग् ज्योतिष, ३२, ५,६, याजुष ज्योतिष, ५-७)
कार्त्तिकेय के स्थान-कार्त्तिकेय ने ६ शक्ति-पीठ बनाये थे जिनको उनकी ६ माता कहते थे। इसी प्रकार बाद में शंकराचार्य तथा गोरखनाथ ने ४-४ पीठ बनाये। कार्त्तिकेय के पीठों के नाम और स्थान हैं-१. दुला-ओड़िशा तथा बंगाल, २. वर्षयन्ती-असम, ३. चुपुणीका-पंजाब, कश्मीर (चोपड़ा उपाधि), ४. मेघयन्ती-गुजरात राजस्थान-यहां मेघ कम हैं पर मेघानी, मेघवाल उपाधि बहुत हैं। ५. अभ्रयन्ती-महाराष्ट्र, आन्ध्र (अभ्यंकर), ६. नितत्नि-तमिलनाडु, कर्णाटक। अतः ओड़िशा में कोणार्क के निकट बहुत से दुला देवी के मन्दिर हैं। दुलाल = दुला का लाल कार्त्तिकेय।
अत्र जुहोति अग्नये स्वाहा, कृत्तिकाभ्यः स्वाहा, अम्बायै स्वाहा, दुलायै स्वाहा, नितत्न्यै स्वाहा, अभ्रयन्त्यै स्वाहा, मेघयन्त्यै स्वाहा, चुपुणीकायै स्वाहेति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१/४/१-९)
गौरी तथा पार्वती-पार्वती काले रंग की थी। चण्डी पाठ (५/८७-८८) के अनुसार कौशिकी के निकलने पर वे काली हो गयी थी। यह मनुष्य रूप नहीं है। इसका एक अर्थ है कि वाक् के ४ पद हैं, ३ पद मन के भीतर हैं जिनको गौरी कहते हैं। चतुर्थ पद वैखरी बाहर निकलता है जिसमें कई अर्थ छिप जाते हैं, अतः उसे तम या कृष्ण कहते हैं।
गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी।
अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन्॥४१॥
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥४५॥ (ऋग्वेद, १/१६४/४१, ४५)
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