जिंदगी स्वयं कविता बन गई है
हौले हौले चीत्कार भरते भरते ,जिंदगी स्वयं कविता बन गई है ।
कभी पशु पक्षी तो कभी मानव ,
चिंघाड़ दहाड़ कलरव तन गई है ।।
भौंकना मिमियाना हिनहिनाना ,
होता समय का यह तकाजा है ।
आजीवन संघर्ष ही करते करते ,
अंत में निकलता ये जनाजा है ।।
चूहे और बिल्ली का खेल यही ,
आजीवन ऐसे चलता रहता है ।
खा लो पी लो कर लो तुम ऐश ,
ज्ञानी चूहा भी यही कहता है ।।
शरारत कहूॅं मैं स्वयं ही अपनी ,
या कह दूॅं उस महाकाव्य की ।
सृष्टि ने जिंदगी मुझको दी थी ,
जिंदगी हो गई मेरी बेताब की ।।
क्या बताउॅं जिंदगी की कहानी ,
जिंदगी व काव्य में ठन गई है ।
सौत बनकर आई यह व्याधि ,
जिंदगी ही काव्य हेतु तन गई है ।।
( आर आर अस्पताल दिल्ली से )
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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