साहित्य में गीत के प्रतिनिधि कवि हैं बुद्धिनाथ मिश्र, गीतों में आम्र-मंजरों की मादक गंध

- पटना पुस्तक महोत्सव में गीत-संग्रह 'गीत उत्तरा फाल्गुनी' का हुआ लोकार्पण
पटना, २५ मार्च। भारत की गेय साहित्य की महान परंपरा में, हिन्दी गीत के प्रतिनिधि कवि हैं पं बुद्धिनाथ मिश्र, जिनकी रचनाओं का मूल स्वर प्रेम और ऋंगार है। मिश्र जी के गीतों में वासंती-हवा और आम्र-मंजरों की मादक गंध है, जो श्रोताओं और पाठकों को मदन-रस से ही नहीं जीवन के प्रति रागात्मक उत्साह भी भरती है।

समारोह के मुख्य अतिथि और वरिष्ठ कवि राम उपदेश सिंह 'विदेह' ने कहा कि बुद्धिनाथ जी एक ऐसे गीतकार हैं, जिन्होंने हिन्दी काव्य में गीत को पुनः शीर्ष-स्थान पर बिठाया है। वरिष्ठ उपन्यासकार और पत्रकार विकास कुमार झा ने कहा कि मिश्र जी ने हिन्दी साहित्य में गीत को पुनर्जीवन प्रदान किया है। साहित्य से गीत को हाशिए पर धकेला जा रहा था। उस प्रवृत्ति को मिश्र जी के गीतों ने कवि नेपाली की भाँति ही रोका है।
वरिष्ठ कवि और पत्रकार प्रो कलानाथ मिश्र ने कहा कि बुद्धिनाथ जी गीति-काव्य के गौरव पुरुष हैं। इन्हें सुनना और पढ़ना दोनों ही आनन्द-प्रद है। वरिष्ठ कवि डा उपेंद्र पाण्डेय ने कहा कि मिश्र जी की रचनाओं में 'प्रेम' को अनेक विम्ब मिले हैं। मैथिली के वरिष्ठ कथा-लेखक अशोक कुमार झा, कवि अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ गजलगो संजय कुमार कुंदन, युवा कवयित्री संस्कृति मिश्र, डा अनिल प्रसाद, ज्योत्सना प्रसाद, शुभचंद्र सिन्हा तथा कवयित्री रेणु मिश्र ने भी कवि को अपनी शुभकामनाएँ प्रदान की।
कृतज्ञता-ज्ञापन के क्रम में कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि 'उत्तरा फाल्गुनी' का अर्थ इस रूप में लिया गया है कि फाल्गुन अर्थात वसंत यौवन का प्रतीक है और उत्तरा फाल्गुनी, यौवन के बाद का बोधक है। अर्थात यौवन के पश्चात के भाव। इस संग्रह में प्रौढ़-विचारों की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने अपने गीतों का सुंदर पाठ भी किया।विशेष आग्रह पर उन्होंने अपना लोकप्रिय गीत 'एक बार और जाल फेंक रे मछेरे / जाने किस मछली में बंधन की चाह हो' का भी सस्वर पाठ किया। मंच का संचालन युवा कवि डा कुमार विमलेन्दु सिंह ने तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रलेक प्रकाशन के निदेशक जीतेन्द्र पात्रों ने किया।
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