हिन्द राष्ट्र है प्रिय हिन्दू का यह ,
सत्य संत सनातन कहलाया है ।हिन्द का तिरंगा हिन्दू का भगवा ,
देखो अंबर में कैसा लहराया है ।।
अंबर में देखो भगवा है लहराता ,
भगवा में कोई आडंबर नहीं है ।
भगवा में देखो भगवान बसा है ,
भगवा में बसा ये पैगंबर नहीं है।।
जाति मिला यह हर युग में है ,
अन्य धर्म कहाॅं यह तो आया है ।
हर युग में नाम सनातनी देखो ,
शेष धर्म देखो यह भरमाया है ।।
सत्ययुग दूजा धर्म यह कहाॅं है ,
दूजा धर्म कहाॅं है यह त्रेता में ।
द्वापर में भी इसका पता नहीं है ,
शेष धर्म बहे धन के चहेता में ।।
लूटनेवाले बहुत ही लूटकर गए ,
क्या अभी लूटना यह बाकी है ?
कंगाल बनाकर गए थे ये गोरे ,
अब लूटने को इस्लाम बाकी है ?
क्या परिणाम सम्मान देने का है ,
या अपने घर में स्थान देने का ?
क्या आदर स्नेह अपराध हमारा ,
या बेवफाई पर न ध्यान देने का ?
हिन्दू का हिन्द जो आदिकाल से ,
इस्लामिक वक्फ बोर्ड कहाॅं से ?
हिन्द सनातन यह सोया नहीं है ,
दफा होना होगा शीघ्र यहाॅं से ।।
ख्याली पुलाव पकाना छोड़ दो ,
नभ उड़ने की कोशिश छोड़ दो ।
रहना है यदि भारतीय बनकर ,
तन मन में पर लगाना छोड़ दो ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश छपरा , बिहार ।
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