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"उलझी हुई ज़िन्दगी"

"उलझी हुई ज़िन्दगी"

दर्द की लहरें, कभी चाहतों का समुंदर,
अश्क़ों का सावन, कभी हँसी की चादर।
इन्हीं में छुपी है, बस हर साँस की रवानी,
इन्हीं में बसी है, हर जिंदगी की कहानी।


अगर मिल ही जाए हर राह की मंज़िल,
तो सफ़र का मज़ा फिर कहाँ रह जाएगा?
जो उलझन न हो, जो तड़प न बचे,
तो जीने का मतलब कहाँ रह जाएगा?


इन उलझनों में ही तो ख़ुदा की रज़ा है,
यही हमें मजबूत बनाए रखती हैं।
जो गिरकर संभलना सिखा न सके,
वो राहें क्या मंज़िल तक पहुंचा सकी हैं?


तो रहने दो इन धागों को ऐसे ही गुंथने,
कभी हल्के, कभी सख्त, कभी बिखरने।
क्योंकि सुलझ जाए गर ये धागों का मेला,
तो रह जाएगा बस एक सूना सा रेला।


उलझी है तो उलझी ही रहने दीजिए,
गर सुलझ ही गई, तो क्या ज़िंदगी है!
ये धागे जो आपस में उलझे हुए हैं,
यही तो हमारी असली तिश्नगी है।


. स्वरचित, मौलिक एवं पूर्वप्रकाशित


"कमल की कलम से"

(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)


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