विक्रम संवत्
अरुण कुमार उपाध्यायविक्रम संवत् अभी तक हमारे पर्वों का आधार है। अतः इस संवत् तथा स्वयं विक्रमादित्य को अस्वीकार करने का प्रयत्न पिछले २०० वर्षों से चल रहा है। अल बरूनी तथा अबुल फजल भी भारतीयों के शत्रु थे, किन्तु उन लोगों ने अंग्रेजों जैसा झूठ नहीं लिखा। अभी तक भारत में अंग्रेजी नकल ही चल रही है। विक्रम संवत् को बदलने के लिए १८९०, १९२५, १९५७ में पञ्चाङ्ग सुधार समितियां बनीं तथा २००१ में भी भारत सरकार ने इसमें सुधार के लिए प्रस्ताव मांगा था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आग्रह पर मैंने ५० पृष्ठ का उत्तर दिया था। मूल प्रश्न यह है कि विक्रम संवत् में भूल क्या है, अभी तक इसका पता नहीं चला है। किस भूल का सुधार करने के लिये व्याकुल हैं? नया तथाकथित राष्ट्रीय शक संवत् आरम्भ करने वालों को शक तथा संवत् का अर्थ नहीं पता चला यद्यपि उन लोगों ने न्यूगेबायर को उद्धृत कर कहा कि २ प्रकार की वर्ष गणना होती है (Exact Sciences of Antiquity, page 156)।७५६ ईपू में आरम्भ शूद्रक शक को मालवगण शक कहते थे जब ४ अग्निवंशी राजाओं परमार, प्रतिहार, चाहमान, चालुक्य का संघ बना था। इन राजाओं की वंशावली उसी काल से आरम्भ हुयी थी। कर्नल टाड ने इस शक के लोप के लिए वंशावलियां नष्ट की तथा उनका आरम्भ कुछ समय बाद ७२५ ईपू. से कर दिया। मालव गण शक में मन्दसौर शिलालेख है, जिसकी चर्चा पण्डित भगवद्दत्त ने भारतवर्ष के बृहत् इतिहास में विस्तार से की है। मालव गण की समाप्ति पर श्रीहर्ष शक ४५६ ईपू में आरम्भ हुआ जिसका वर्णन अल बरूनी ने किया है। इस ३०० वर्ष के गणतन्त्र काल का वर्णन ग्रीक लेखक सोलिनस ने किया है, जो मेगास्थनीज के नाम से उसकी इण्डिका में उद्धृत है। विक्रम संवत् का उल्लेख कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण (१०/१११, २२/१३) में है। किन्तु उसी अध्याय में वर्णन है कि विक्रमादित्य ने रुक्म देश के शकाधिपति (रोम का जुलियस सीजर) को महायुद्ध में पराजित कर उज्जयिनी में परेड में घुमाया और छोड़ दिया। अमेरिकी इतिहासकार विल डुरण्ट ने इसे सत्य घटना माना है तथा है कि ईरान के राजा मिट्राडेट्स (मित्रदत्त?) की सहायता के लिए विक्रमादित्य सेना सहित गये थे तथा सीरिया के सेला में सीजर को बन्दी बनाया। इसे छिपाने के लिए रोमन इतिहासकारों की ५ झूठी कथाओं का वर्णन किया है। इसी कारण अंग्रेज इतिहासकार विक्रमादित्य तथा कालिदास का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते तथा उनके प्रभाव में भारतीय लेखक भी वैसा ही करते है। वराहमिहिर (बृहत् संहिता, १३/३), कालिदास (ज्योतिर्विदाभरण, १/२, १७), ब्रह्मगुप्त (ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त, २४/७-८, में इसे चापवंश अर्थात् चाहमान राजा का शक कहा है) ने अपनी गणना का सन्दर्भ ६१२ ईपू के चाप शक को कहा है। उसे इन तीनों की मृत्यु के १०० वर्ष बाद आरम्भ हुए ७८ ई के शालिवाहन शक में गणना कर ४ प्रकार के बार्हस्पत्य संवत्सर कर दिये हैं। ग्रन्थों के समय अनुसार गणना से एक ही बार्हस्पत्य संवत्सर आता है। सभी ने मकर राशि से उत्तरायण तथा कर्क से दक्षिणायन का वर्णन किया है जो विक्रम संवत् के आरम्भ में ही था। कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण को तथा स्वयं कालिदास को काल्पनिक सिद्ध करने के लिए उनके लिखित समय ३०६८ कलि को झूठा सिद्ध करने के लिए व्यतीपात गणना का काल ११६४ शालिवाहन शक किया है। पर वराहमिहिर ने लिखा कि कलि आरम्भ से अयन चक्र पीछे हट गया है। ३०४४ कलि वर्ष में १.५ मास पीछे ऋतु चक्र खिसक गया था, अतः विक्रम संवत् में संवत् आरम्भ १.५ मास पीछे किया और मास आरम्भ गणित अनुसार शुक्ल पक्ष के बदले कृष्ण पक्ष से किया। इस संशोधन के अनुसार गणना करने पर ज्योतिर्विदाभरण लिखित समय सटीक सिद्ध होता है। ज्योतिर्विदाभरण को काल्पनिक मानने पर स्वयं कालिदास का ही अस्तित्व समाप्त हो जाता है क्योंकि इसी ग्रन्थ के अनुसार उन्होंने ३ महाकाव्य लिखे थे, स्वयं इन महाकाव्यों में कालिदास का उल्लेख नहीं है।
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