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संसारी रिश्ता

संसारी रिश्ता

जीवन सफर में एक समय ऐसा दिन भी आता है।
जब सब कुछ मिट जाता है, केवल रिश्ता रह जाता है।।
हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं,पर नाता रिश्ता नहीं छोड़ते हैं।
जग में बदनामी के भय से कभी, मुख नहीं मोड़ते हैं।।
सब रिश्तों में बड़ा पति पत्नी का रिश्ता कहलाता है।
वो भी जवानी में ६३ का पर बुढ़ापे में ३६ का हो जाता है।।
अब प्रेम खत्म, केवल नून तेल का हिसाब रह जाता है।
ऐसे में बुढ़ापे का दिन, भारी बोझ बन जाता है।।
जन्म देने वाले माँ बाप, पहले ही छूट जाते हैं।
अपने बच्चे ही अब जीवन पर हावी हो जाते हैं।।
मौन रहकर शांत रहना तब हर रिश्ते की दुहाई है।
उम्र के अंतिम पड़ाव पर, कछुआ जैसा हाथ पांव सिकोड़ लेने में ही भलाई है।।
पहले ज्ञान बाँटा जाता था, अब बुजुर्ग ज्ञानी डांटा जाता है।
बुजुर्गों की बातें, नयी पीढ़ी को एक दम नहीं सुहाता है।।
ऐसे में शांत रहना, मौन रहना, सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।
उलझ कर कोई क्या करेगा, क्योंकि रिश्ता तो निभानी है।। 
 जय प्रकाश कुंवर
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